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ईटिंग जेटलैग: शनिवार-रविवार की ये एक आदत बढ़ा सकती है हृदय रोगों का जोखिम, पुरुष सबसे ज्यादा खतरे में

Sat, 19 Sep 2026 12:36 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

एक लाख से ज्यादा लोगों पर करीब 8 साल तक किए गए विश्लेषण में शोधकर्ताओं ने पाया कि सप्ताह के दिनों के मुकाबले, वीकेंड में खाने के समय में बदलाव पुरुषों में हृदय की बीमारियों के ज्यादा खतरे को बढ़ा देता है। हर एक घंटे के अंतर के साथ खतरा 14 प्रतिशत बढ़ाता देखा गया है। पुरुषों में ये खतरा अधिक देखा गया है। 
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हृदय रोगों का खतरा - फोटो : AmarUjala.com/AI
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विस्तार
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दुनियाभर में बढ़ रही क्रॉनिक बीमारियां चाहे वो डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर हो या फिर हार्ट-किडनी की बीमारी, इन सभी में लाइफस्टाइल की गड़बड़ी बहुत कॉमन है। भले ही इस तरफ हमारा ध्यान न जाता हो, पर दिनभर में हम जो कुछ भी करते हैं, ऑफिस में जिस तरह से काम करते हैं, खाते हैं या फिर सोते हैं, इन सभी का हमारी सेहत पर सीधा असर होता है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ कम उम्र से ही सभी लोगों को अपनी लाइफस्टाइल को ठीक रखने की सलाह देते हैं। कम उम्र से ही आदत सही रखने से आगे चलकर कई बीमारियों के खतरे को काफी कम करने में मदद मिल सकती है।

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स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, हर हफ्ते सभी लोगों को कुछ समय निकालकर समीक्षा करनी चाहिए कि क्या हमारी लाइफस्टाइल इन दिनों में सेहत के लिहाज से ठीक रही है? आमतौर पर ज्यादातर लोगों की सोमवार से शुक्रवार तक जिंदगी एक तय रफ्तार में चलती है। सुबह उठने से लेकर ऑफिस जाने तक का समय तय होता है, इन दिनों में नाश्ता, लंच और डिनर का समय भी लगभग फिक्स रहता है। लेकिन जैसे ही शनिवार-रविवार आता है, पूरा रूटीन बदल जाता है।

वीकेंड पर देर से उठना, नाश्ता देर से करना या छोड़ देना, डिनर भी सामान्य दिनों से काफी देर से करना आम बात है। हमें लगता है कि दो दिन की यह छोटी-सी आजादी शरीर पर क्या ही असर डालेगी? लेकिन वीकेंड की इन छोटी-छोटी आदतों से होने वाले जोखिमों को लेकर विशेषज्ञों ने बड़ी चेतावनी जारी की है।
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अगर आप भी वीकेंड पर खुद को थोड़ा फ्री करने के चक्कर में लाइफस्टाइल खराब कर लेते हैं, तो आइए इसके गंभीर दुष्प्रभावों के बारे में जान लेते हैं।

वीकेंड पर देर से खाने की आदत के खतरे - फोटो : Freepik.com
ईटिंग जेटलैग का सेहत पर क्या असर होता है?

वीकेंड पर होने वाले दिनचर्या में बदलाव सेहत पर किस तरह से असर डालते हैं, किन आदतों का सबसे ज्यादा खतरा हो सकता है? इसे समझने के लिए फ्रांस में 1 लाख से ज्यादा लोगों पर करीब 8 साल तक नजर रखी गई।इसमें शनिवार-रविवार यानी छुट्टी के दिनों में खाने के समय में बदलाव पर खास ध्यान दिया गया। इसमें ये समझने की कोशिश की गई कि ये छोटा सा बदलाव दिल की सेहत पर क्या असर डाल सकता है?
 
  • सप्ताह के दिनों और वीकेंड में खाने के समय के आगे-पीछे होने को विशेषज्ञों ने ईटिंग जेटलैग नाम दिया।
  • मसलन अक्सर लोग काम के दिनों में जैसे सोमवार से शुक्रवार तक रात का खाना रात 8-9 बजे के बीच खा लेते थे, वहीं शनिवार-रविवार को डिनर की आदत रात 10 बजे या उससे भी बाद में देखी गई। 
  • शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन पुरुषों के खाने का समय वीकेंड पर बदलता था, उनमें हृदय संबंधी बीमारी का खतरा उन लोगों की तुलना में ज्यादा था, जिनका खाने का समय पूरे सप्ताह लगभग एक जैसा रहता था। 
  • खाने के समय में हर एक घंटे के अंतर के साथ पुरुषों में हृदय संबंधी बीमारियों के खतरे में 14 प्रतिशत और कोरोनरी हार्ट डिजीज के खतरे में 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई।

गौरतलब है कि महिलाओं की सेहत पर इसका ज्यादा कोई दुष्प्रभाव नोटिस नहीं किया गया। 

विशेषज्ञों ने कहा, रिसर्च यह नहीं कहती कि वीकेंड पर खाने का समय बदलते ही किसी व्यक्ति को दिल की बीमारी हो जाएगी। बल्कि यह लंबे समय में खाने के समय की अनियमितता और हृदय स्वास्थ्य के बीच संभावित संबंध की ओर इशारा करती है।

खाने के समय में बदलाव का हृदय स्वास्थ्य पर असर - फोटो : Adobe Stock Photos
अध्ययन में क्या पता चला?

कम्युनिकेशंस मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित ये अध्ययन लोगों को अपनी लाइफस्टाइल को लेकर अलर्ट रहने की सलाह देती है। शोधकर्ताओं ने बताया, ईटिंग जेटलैग को दिल और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ाने वाला पाया गया है। 
 
  • फ्रांस में किए गए अध्ययन में शामिल 1 लाख से ज्यादा लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इन लोगों की औसत उम्र करीब 42 साल थी
  • शोधकर्ताओं ने लोगों को उनके खाने के समय के आधार पर अलग-अलग समूहों में बांटा। 
  • एक समूह के लोग सप्ताह के दिनों की तुलना में वीकेंड पर थोड़ा जल्दी खाना खाते थे। दूसरे समूह के लोगों के खाने का समय पूरे सप्ताह लगभग एक जैसा रहता था, वहीं तीसरे समूह के लोग सप्ताह के दिनों के मुकाबले वीकेंड पर देर से खाना खाते थे।

जिन लोगों का खाने का समय पूरे सप्ताह लगभग एक जैसा रहता था, उनकी तुलना में वीकेंड पर खाने का समय बदलने वाले समूह के लोगों में कोरोनरी हार्ट डिजीज का जोखिम अधिक देखा गया। 

एक घंटे का अंतर भी हो सकता है खतरनाक

पुरुषों में इसके खतरे ज्यादा देखे गए। सप्ताह के दिनों और वीकेंड के बीच खाने के समय में हर 1 घंटे के अंतर के साथ हृदय संबंधी बीमारी का खतरा 14 प्रतिशत और कोरोनरी हार्ट डिजीज का खतरा 21 प्रतिशत ज्यादा पाया गया। हालांकि, महिलाओं में खाने के समय और हृदय संबंधी बीमारी के बीच ऐसा कोई महत्वपूर्ण संबंध नहीं मिला। इसी तरह, खाने के समय में बदलाव का स्ट्रोक के जोखिमों के बीच भी कोई लिंक नहीं पाया गया है ।
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हृदय रोग के खतरे के बारे में जानिए - फोटो : Freepik.com
पुरुषों-महिलाओं में ये अंतर क्यों?

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, पुरुषों-महिलाओं के बीच दिखने वाले इस अंतर का एक कारण यह हो सकता है कि पुरुषों में सामान्य तौर पर हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा महिलाओं की तुलना में पहले से ज्यादा होता है। पुरुषों और महिलाओं की जीवनशैली, काम करने के तरीके और शरीर में होने वाली जैविक प्रक्रियाओं में अंतर भी इन नतीजों को समझाने में भूमिका निभा सकता है।
 
  • शोधकर्ता कहते हैं, इन नतीजों से संकेत मिलता है कि सप्ताह के दिनों और वीकेंड के बीच खाने के समय में अंतर हृदय संबंधी बीमारियों की शुरुआत में भूमिका निभा सकते हैं। 
  • दिल की सेहत के लिए सिर्फ यह देखना जरूरी नहीं है कि व्यक्ति किस समय खाना खाता है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि उसके खाने का समय कितना नियमित है?

गौरतलब है कि कार्डियोवैस्कुलर डिजीज में दिल की बीमारी और स्ट्रोक दोनों शामिल हैं। इन बीमारियों के कारण हर साल लाखों लोगों की मौत हो जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, धूम्रपान, खराब खान-पान, जरूरत से ज्यादा वजन और शारीरिक गतिविधि की कमी इसका प्रमुख कारण माने जाते रहे हैं। इसके साथ सभी लोगों को खाने-पीने की आदतों और इसके समय पर भी गंभीरता से ध्यान देते रहना चाहिए।



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स्रोत: 
Eating jetlag based on meal timing discrepancies and risk of cardiovascular disease using the prospective cohort NutriNet-Santé


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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