मुझे यह तक पता नहीं था कि मौसी की मौत हुई कैसे?
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मुझे यह तक पता नहीं था कि मौसी की मौत हुई कैसे? बेहद मामूली-सा तो ऑपरेशन था। पथरी ही तो हुई थी और डॉक्टरों ने कहा था ऑपरेशन के बाद ठीक हो जाएंगी। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि मेरी मौसी की आंखें कभी नहीं खुली। रास्ते भर मौसी को याद करती। कभी रो लेती और कभी आंसुओं को छिपाती मैं देहरादून पहुंचीं। तब जाकर पता चला कि मौसी को ऑपरेशन के बाद लगने वाला आखिरी इंजेक्शन गलत दे दिया गया था।
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मौसी ऑपरेशन के बाद हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने वाली थीं।
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मौसी ऑपरेशन के बाद हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने वाली थीं। हॉस्पिटल भी देहरादून का नामी गिरामी हॉस्पिटल था। मौसी को घर ले जाने के लिए परिवार एकजुट हुआ था। डिस्चार्ज से पहले नर्स ने उन्हें एक इंजेक्शन दिया और मौसी की तबियत बिगड़ गई। डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिये। मौसी को दूसरे हॉस्पिटल ले जाने के लिए कहा गया। आनन-फानन में मौसा जी और परिवार के दूसरे लोग, मौसी को लेकर दूसरे अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि मौसी मर चुकी हैं।
पथरी के बेहद मामूली से ऑपरेशन में मौत!
किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। ऐसी स्थिति में परिवार वालों का हाल ऐसा ही होता है। मौसा जी तो एकदम से टूट गए थे। नानी का रो-रोकर बुरा हाल था। मौसी का लड़का उस वक्त 12 साल का था और वह पौड़ी में था, हम सब देहरादून से मौसी के शव को पौड़ी ले जा रहे थे।
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मौसी पौड़ी में पढ़ाती थीं। मौसाजी भी शिक्षक ही हैं। बहुत दिनों से मौसी को रह-रहकर पेट में जोरों का दर्द उठ रहा था। अच्छे इलाज के लिए पौड़ी से देहरादून लाया गया था लेकिन मौसी का शव घर पहुंचा। नानी को बहुत समझाया लेकिन वह पोस्टमॉर्टम के लिए नहीं मानी और अस्पताल की बहुत बड़ी लापरवाही ऐसे ही दब गई। मौसी की उम्र 35 साल थी। हंसमुख और मिलनसार मौसी का चेहरा मैं आज तक नहीं भूल पाती। नानी से भी शिकायत है। अगर वह जिद नहीं करती तो मौसी के इलाज में लापरवाही बरतने वाले अस्पताल और डॉक्टरों को इसकी सजा जरूर मिलती।
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यह कहानी कल्पना (बदला हुआ नाम) से बातचीत पर आधारित है। कल्पना पेशे से पत्रकार हैं। )