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Warning: फेफड़ों के कैंसर की वजह सिर्फ धूम्रपान नहीं, ये दो चौंकाने वाले कारण भी आए सामने; हो जाइए सावधान

Sat, 19 Jul 2025 07:51 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • फेफड़ों के कैंसर से संबंधित एक हालिया रिपोर्ट में कुछ नई और चिंता बढ़ाने वाली बातें सामने आई हैं। विशेषज्ञों की टीम ने बताया कि सिर्फ धूम्रपान ही इस कैंसर के बढ़ते मामलों की वजह नहीं है, वायु प्रदूषण और कई अन्य कारणों से भी फेफड़ों के कैंसर का खतरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। 
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फेफड़ों के कैंसर का बढ़ता खतरा - फोटो : Freepik.com
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विस्तार
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Lungs Cancer Risk Factors: कैंसर का खतरा दुनियाभर में तेजी से बढ़ता जा रहा है, केवल वयस्क या बुजुर्ग ही नहीं अब बच्चे भी इसका शिकार होते जा रहे हैं। हाल के वर्षों में फेफड़ों के कैंसर के मामलों में तेजी से वृद्धि रिपोर्ट की गई है। पुरुषों में इस कैंसर का खतरा और भी ज्यादा देखा जा रहा है।

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आंकड़ों के अनुसार साल 2022 में दुनियाभर में फेफड़ों के कैंसर के 25 लाख नए मामले सामने आए और इससे 18 लाख से अधिक लोगों की मौत हो गई। तंबाकू-धूम्रपान इसका प्रमुख जोखिम कारक हैं, जो लगभग 85% फेफड़ों के कैंसर के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

हालांकि फेफड़ों के कैंसर से संबंधित एक हालिया रिपोर्ट में कुछ नई और चिंता बढ़ाने वाली बातें सामने आई हैं। विशेषज्ञों की टीम ने कहा है कि सिर्फ धूम्रपान ही इस कैंसर के बढ़ते मामलों के लिए जिम्मेदार नहीं है, बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण भी फेफड़ों के कैंसर का खतरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। इसके अलावा अध्ययनों में इस कैंसर के लिए कई अन्य जोखिम कारकों को लेकर भी सावधान किया गया है।

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फेफड़ों में कैंसर - फोटो : Adobe stock
नॉन-स्मोकर्स में बढ़ता कैंसर का खतरा

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सैन डिएगो और नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट (एनसीआई) द्वारा किए गए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया है कि नॉन-स्मोकर्स में भी फेफड़ों के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इसका मतलब है कि अब लंग्स कैंसर के मामले उन लोगों में भी देखे जा रहे हैं जो स्मोकिंग नहीं करते हैं। 

जब इसके पीछे के कारणों का पता लगाने के लिए टीम ने अध्ययन किया तो पता चला कि इसका सीधा संबंध वायु प्रदूषण और पर्यावरणीय कारकों से जुड़ा हो सकता है।

नेचर जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन के निष्कर्ष वैश्विक स्वास्थ्य नीति और शहरी नियोजन के लिए चेतावनी की घंटी की तरह हैं।

लंग्स कैंसर का जोखिम - फोटो : Freepik.com
वायु प्रदूषण और हर्बल दवाएं भी बढ़ा रही है खतरा

वैज्ञानिकों ने बताया अब सिर्फ धूम्रपान ही नहीं, वायु प्रदूषण और कुछ पारंपरिक हर्बल दवाएं भी इंसानों के डीएनए को इतना नुकसान पहुंचा रही हैं कि फेफड़ों में ट्यूमर बनना शुरू हो जाता है।

जिन लोगों ने कभी सिगरेट नहीं छुई, उनके फेफड़ों में भी ऐसे म्यूटेशन पाए जा रहे हैं, जिनसे कैंसर का खतरा हो सकता है। खास बात यह है कि प्रदूषित वातावरण में रहने वाले लोगों में यह म्यूटेशन अधिक मात्रा में मिले हैं।

म्यूटेशन से तात्पर्य है डीएनए अनुक्रम (जेनेटिक कोड) में होने वाला स्थायी परिवर्तन, जो कई स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म देने वाला हो सकता है।

फेफड़ों की बीमारी - फोटो : Adobe Stock
ये भी जानिए

शोध में सामने आया कि ताइवान में पारंपरिक चीनी औषधियों में इस्तेमाल होने वाला एरिस्टोलोचिक एसिड भी फेफड़ों के कैंसर से जुड़ा हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन औषधियों का धुआं सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंचता है और डीएनए को नुकसान पहुंचाता है।

अध्ययन की ये रिपोर्ट भारत के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है, जहां बढ़ता वायु प्रदूषण गंभीर चिंता का विषय रहा है। यहां पर लोग जानलेवा प्रदूषण में सांस लेने को मजबूर हैं जिससे भविष्य में कैंसर का खतरा काफी बढ़ सकता है।
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फेफड़ों के कैंसर का जोखिम - फोटो : Freepik.com
माइक्रोप्लास्टिक के कारण भी बढ़ रहा है जोखिम

इसी से संबंधित एक अन्य हालिया अध्ययन में वैज्ञानिकों की टीम ने चिंता जताई है कि धूम्रपान और वायु प्रदूषण के अलावा माइक्रोप्लास्टिक भी फेफड़ों के कैंसर का जोखिम बढ़ाता जा रहा है। 

हैजर्डस मैटेरियल्स में प्रकाशित इस अध्ययन की रिपोर्ट में ऑस्ट्रिया स्थित मेडिकल यूनिवर्सिटी ऑफ वियना के शोधकर्ताओं ने बताया कि माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक फेफड़ों की कोशिकाओं में घातक परिवर्तन ला सकते हैं जो कैंसर के विकास से जुड़े हैं। बढ़ते वायु प्रदूषण के साथ बढ़ता प्लास्टिक कचरा दोनों कैंसर के खतरे को बढ़ाता जा रहा है, जिसपर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है।



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स्रोत

Microplastics Can Cause Lung Cell Malignancy

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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