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Medical Breakthrough: मौत के बाद भी जिंदा रह सकती है आपकी पहचान, क्या अमरता की ओर बढ़ चुका है विज्ञान?

Tue, 02 Jun 2026 07:48 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

वैज्ञानिकों ने पहली बार एक स्तनधारी प्राणी के मस्तिष्क को मृत्यु के बाद इस तरह संरक्षित करने का दावा किया है कि उसकी सूक्ष्म कोशिकीय संरचना लगभग बिना क्षति के सुरक्षित रही। इस खोज ने नई उम्मीदों को जगा दी है। क्या ये मौत के बाद इंसानों को दोबारा जिंदा करने की तैयारी है?
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मृत इंसान फिर से होंगे जिंदा? - फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
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कल्पना कीजिए किसी व्यक्ति की सांसें थम चुकी हों, दिल धड़कना बंद कर चुका हो और डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया हो। इसके साथ ही उस व्यक्ति के जीवन को समाप्त मान लिया जाता है। पर क्या कुछ ऐसा हो सकता है कि मृत व्यक्ति फिर से जीवित हो सके? सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी लग रही होगी है, लेकिन अमेरिका की एक स्टार्टअप कंपनी इसी विचार को हकीकत में बदलने की कोशिश कर रही है।

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मौत को मात देने वाली पहेली, शायद ऐसी है जिसे मेडिकल साइंस अब तक सुलझा नहीं सका है। मृत व्यक्ति को जिंदा करना सिर्फ फिक्शन फिल्मों का हिस्सा रहा है, असल जिंदगी का नहीं। पर क्या आप भरोसा करेंगे कि संभवत: ये भी अब सच होने की ओर है, वैज्ञानिक इस तरफ भी कदम बढ़ा चुके हैं।

अमेरिकी कंपनी का दावा है कि मौत के बाद भी इंसान के दिमाग की बेहद जटिल संरचनाओं को बिना नुकसान के संरक्षित किया जा सकता है, बशर्ते यह काम सही समय पर किया जाए। ये उस व्यक्ति की यादों, व्यक्तित्व और अस्तित्व सभी को जीवित रखने की पहल हो सकती है, मसलन अमरता की ओर पहला कदम।

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ब्रेन को संरक्षित रखने की प्रक्रिया - फोटो : Adobe Stock
मौत के बाद सुअर के दिमाग को रखा सुरक्षित

वैज्ञानिकों ने हाल ही में सुअर के दिमाग को इसी तरह सुरक्षित रखने में सफलता हासिल की है। ऐसा पहली बार है जब किसी स्तनधारी प्राणी के मस्तिष्क को मृत्यु के बाद इस तरह संरक्षित करने का दावा किया गया है कि उसकी सूक्ष्म कोशिकीय संरचना बिना क्षति के सुरक्षित रहीं।
 
  • अमेरिकी स्टार्टअप कंपनी नेक्टोम ने सुअर के मस्तिष्क पर यह प्रयोग किया है अब वह इसी तकनीक को  इंसानों के साथ अध्ययन करने की योजना बना रहे हैं। 
  • सुअर इसलिए चुने गए क्योंकि उनका दिमाग और रक्त संचार प्रणाली काफी हद तक इंसानों जैसी मानी जाती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक किसी व्यक्ति को पुनर्जीवित करने का प्रमाण नहीं है।
  • फिलहाल इसे मस्तिष्क संरक्षण की दिशा में वैज्ञानिक उपलब्धि के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

इंसान की यादों को रखा जा सकेगा संरक्षित? - फोटो : Freepik.com
ब्रेन में कनेक्टोम को बचाने की कोशिश

यह पूरा प्रयास कनेक्टोम नामक अवधारणा पर आधारित है। कनेक्टोम मस्तिष्क में मौजूद न्यूरॉन्स और उनके बीच बने संपर्कों के विशाल नेटवर्क को कहा जाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि व्यक्ति की यादें, व्यक्तित्व और सोचने की प्रक्रियाएं इसी नेटवर्क में छिपी होती हैं। यदि इस नेटवर्क को सुरक्षित रखा जा सके, तो सैद्धांतिक रूप से किसी व्यक्ति के मानसिक अस्तित्व से जुड़ी जानकारी भी संरक्षित रह सकती है।
 
  • वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि मृत्यु बाद मस्तिष्क सुरक्षित रखा जा सके, तो भविष्य में मानव मस्तिष्क का अधिक विस्तृत मानचित्र बनाना संभव होगा।
  • इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि यादें, व्यक्तित्व, निर्णय लेने की क्षमता और चेतना जैसी जटिल प्रक्रियाएं मस्तिष्क में कैसे संग्रहीत होती हैं। 
  • संरक्षित मस्तिष्कों के अध्ययन से अल्जाइमर, पार्किंसन और डिमेंशिया जैसी बीमारियों को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।

मस्तिष्क को बिना नुकसान पहुंचाए बिना रखा जा सकेगा सुरक्षित - फोटो : Adobe stock photos
कैसे किया गया ये संरक्षण?

स्टार्टअप कंपनी नेक्टोम ने सुअर की मौत के करीब 10 मिनट बाद दिल के जरिए एक ट्यूब डाली और शरीर से खून बाहर निकाल दिया। इसके बाद ऐसे रसायन दिमाग में पहुंचाए गए जो कोशिकाओं और प्रोटीनों को उसी स्थिति में लॉक कर देते हैं, ताकि उनकी बनावट खराब न हो।
 
  • इसके बाद ब्रेन में विशेष प्रकार के तरल पदार्थ डाले गए, जो दिमाग के अंदर मौजूद पानी की जगह ले लेते हैं। संरक्षण प्रक्रियाओं के दौरान ये दिमाग में डाले गए तरल को बर्फ के क्रिस्टल बनने से रोकने में भी मदद करते हैं।
  • फिर दिमाग का तापमान घटाकर करीब -32 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा दिया गया। इस तापमान पर ऊतक (टिश्यू) सैकड़ों साल तक सुरक्षित रह सकते हैं।

हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में समय सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ। वैज्ञानिकों ने पाया कि अगर मौत के लगभग 10-14 मिनट के अंदर ये काम शुरू कर दिया जाए तो कोशिकाओं को क्षति से बचाया जा सकता है। माइक्रोस्कोप से जांच करने पर पाया गया कि न्यूरॉन्स, उनके बीच के कनेक्शन और उन्हें जोड़ने वाले अणु काफी अच्छी स्थिति में सुरक्षित मिले।

गौरतलब है कि मौत के बाद कोशिकाओं के अंदर मौजूद एंजाइम ऊतकों को तोड़ना शुरू कर देते हैं। एक बार यह प्रक्रिया शुरू हो जाए तो फिर किसी अंग को सुरक्षित नहीं किया जा सकता, इसलिए समय बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
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विज्ञान का नया चमत्कार - फोटो : Adobe Stock
क्या कहते हैं वैज्ञानिक?

वैज्ञानिकों का मानना है कि दिमाग की वायरिंग को सुरक्षित रखकर किसी व्यक्ति की मानसिक पहचान को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। हालांकि यहां एक बड़ी समस्या है, आज की तकनीक इतनी विकसित नहीं है कि सुरक्षित रखे गए दिमाग से किसी इंसान की चेतना या यादों को दोबारा पढ़ा जा सके।

इस चुनौती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चूहे के दिमाग के एक छोटे हिस्से का कनेक्टोम मैप तैयार करने में वैज्ञानिकों को करीब 7 साल लग गए थे। इंसानी दिमाग उससे लगभग 1000 गुना बड़ा और जटिल है।
 
  • विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई चिकित्सा नहीं बल्कि सिर्फ रासायनिक संरक्षण है। दिमाग की संरचना भले सुरक्षित रह जाए, लेकिन वह जैविक रूप से मृत ही रहेगा।
  • कुछ वैज्ञानिक यह सवाल भी उठाते हैं कि अगर भविष्य में दिमाग की पूरी जानकारी निकालकर किसी व्यक्ति की कॉपी बनाई जाती है, तो क्या वह वास्तव में वही व्यक्ति होगा या सिर्फ उसकी एक प्रतिकृति?
  • दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि दिमाग की संरचना सुरक्षित कर लेना और उसके काम करने की क्षमता वापस लाना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। 

फिलहाल यह तकनीक किसी को दोबारा जिंदा करने का दावा नहीं करती। लेकिन इतना जरूर दिखाती है कि दिल रुकने के साथ ही दिमाग की सारी जानकारी तुरंत गायब नहीं हो जाती। सही समय पर सही प्रक्रिया अपनाई जाए तो उसे संरक्षित किया जा सकता है। यदि भविष्य में इंसानी दिमाग भी इसी तरह सुरक्षित किए जाने लगे, तो ये किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं होगा।




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स्रोत:
Scientists preserve an entire pig brain using a technique that will now be offered to humans who hope to be reanimated in the future


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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