सोशल मीडिया पर अजीबो-गरीब कंटेंट का दौर
इन वीडियो की खासियत यह है कि इनमें कहानी समझने की जरूरत नहीं पड़ती। स्क्रीन पर कुछ ऐसा दिखाई देता है जिसकी उम्मीद दिमाग ने नहीं की होती। कॉफी को अचानक नाचते देखना या टॉयलेट को गाते हुए सुनना इसी तरह का अप्रत्याशित अनुभव है। ऐसी नई और अजीब चीजें तुरंत ध्यान खींचने वाली लग सकती हैं। इसके बाद मजेदार आवाज, तेज कटेंट, रंगीन दृश्य और कुछ सेकंड का छोटा वीडियो आपको अंत तक देखने के लिए रोक सकता है।
- स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, इसमें एक और मनोवैज्ञानिक पहलू काम करता है। दिनभर पढ़ाई, नौकरी, घर और दूसरी जिम्मेदारियों के बीच हमारा दिमाग लगातार जानकारी लेता रहता है।
- ऐसे में बिना ज्यादा सोच-विचार के देखी जाने वाली मजेदार रील्स थोड़ी देर के लिए ध्यान दूसरी तरफ ले जाती हैं।
- हंसी और मनोरंजन, तनाव से अस्थायी राहत देने में मदद कर सकते हैं। इसलिए लोग ऐसी रील्स को मानसिक ब्रेक की तरह भी देख सकते हैं।
लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब कुछ सेकेंड्स का मनोरंजन घंटों की स्क्रॉलिंग में बदल जाता है। एक रील देखने के बाद दूसरी और फिर तीसरी रील अपने आप चलती रहती है। लगातार छोटे-छोटे और उत्तेजना वाले वीडियो देखने की आदत ध्यान बनाए रखने, नींद और रोजमर्रा के कामों पर असर डाल सकती है।
दिमाग को मिलता है सेरोटोनिन बूस्ट
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, ऑफिस के काम से घर लौटने के बाद इस तरह के आनंददायक रील्स लोगों के जीवन का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं। लोग शुरू तो एक रील से करते हैं लेकिन इससे मिलने वाला दिमाग को मिलने वाला सेरोटोनिन बूस्ट खुशी और तनावमुक्ति का अहसास कराता है।
- इसके चलते आप एक के बाद दूसरा, फिर दूसरे के बाद तीसरा रील देखते जाते हैं और इसमें घंटे निकल सकते हैं। विशेषतौर पर रात में लंबे समय तक रील्स देखते रहना और फोन चलाना नींद का समय को बाधित कर सकता है।
- स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, नाचती कॉफी या गाती सब्जियां देखना अपने आप में मानसिक बीमारी का कारण नहीं है। असली सवाल यह है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल कितना हो रहा है और क्या वह आपकी नींद, पढ़ाई, काम, रिश्तों या मूड को प्रभावित करने लगा है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
मनोरंजन के लिए रील्स देखना ठीक है, लेकिन अगर फोन बंद करना मुश्किल लगे या बिना स्क्रॉल किए बेचैनी होने लगे, तो अपनी सोशल मीडिया आदत पर ध्यान देना जरूरी है।
अमेरिका की रोवन यूनिवर्सिटी के डिजिटल कल्चर शोधकर्ताओं डॉ. मैक्सी हेटमेयर और अन्ना गोट्जफ्राइड ने इसके प्रभावों को समझने के लिए अध्ययन किया। इसमें 13 से 26 वर्ष के युवाओं से बातचीत के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि यह सोशल मीडिया की उस दुनिया से अचेतन विद्रोह का तरीका हो सकता है, जहां हर पोस्ट के पीछे यूजर का ध्यान और उससे कमाई हासिल करने की कोशिश रहती है।
हर चीज कंटेंट है तो ब्रेन रॉट एंटी-कंटेंट
- युवाओं का कहना है कि आमतौर पर सोशल मीडिया की ज्यादातर पोस्ट उनसे कुछ न कुछ चाहती हैं- कुछ खरीदना, कुछ सीखना या खुद को बेहतर दिखाना।
- बेतुकी रीलें इसके उलट हैं। वे उनसे कुछ नहीं मांगतीं। युवाओं के मुताबिक, जब हर चीज कंटेंट बन गई है तो ब्रेन रॉट उसका एंटी-कंटेंट है।
अध्ययन के मुताबिक घंटों एल्गोरिदम के हिसाब से चलने वाली टाइमलाइन स्क्रॉल करने के बाद युवा थकी और कम-चयनात्मक मानसिक अवस्था में पहुंच जाते हैं। ऐसे में वे सामने आने वाली सामग्री को बिना ज्यादा सोचे देखते रहते हैं। हालांकि लंबे समय में ये आदत स्क्रीन टाइम को बढ़ाने वाली हो सकती है, साथ ही कुछ मामलों में इसके संज्ञानात्मक क्षमता पर असर पड़ने का भी जोखिम हो सकता है।
--------------
स्रोत:
Modern Day High: The Neurocognitive Impact of Social Media Usage
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।