उस दौरान कई दुष्चक्र थे। जमीन के मालिक कम पैसे में रखरखाव कर रहे थे। उस दौरान मृत्यु दर बहुत अधिक थी और लोग कम पैसे में ही गुजारा करने पर राजी हो जाते थे। परिणाम यह हुआ कि बुरी परिस्थितियों में रहने की वजह से हैती में आधे गुलाम पहले साल में ही मर गए।
इस घटना के बाद विदेशों से गुलामों के व्यापार का चलन भी बढ़ा। हर साल हजारों गुलामों का व्यापार होने लगा। उस समय भी नस्लभेद चरम पर था। गोरे और काले का भेद बहुत था। हालांकि इसमें भी काफी तरह के मुद्दे थे।
फ्रांसीसी इतिहासकार पॉल फ्रेगोसी इस मुद्दे पर गहराई से नजर डालते हैं। वो कहते हैं, ''गरीब गोरा, अमीर गोरे को बर्दाश्त नहीं करता था। अमीर गोरा गरीब गोरे को नीचा दिखाता था। मध्यम वर्ग का जीवन जीने वाले गोरे जलन में रहते थे।''
''इनके बीच मुलटोस भी थे। मुलटोस वो लोग थे जिन्होंने काले लोगों को फिर से अस्तित्व में लाने का काम किया। उन्होंने काले लोगों को एक तरह से वापस लौटने का मौका दिया और गोरों का तिरस्कार किया।''
1791 में गुलामों ने बगावत का बिगुल फूंका। इसी बगावत ने सिविर वॉर की शुरुआत कराई और जातियों के बीच लड़ाइयां होने लगीं। साल 1794 में फ्रांस ने अपने सभी कैरिबियाई उपनिवेशों में गुलामी को समाप्त कर दिया।
नेपोलियन ने साल 1801 की शुरुआत में सेना भेजना शुरू किया और 1802 की जनवरी के आखिर में शुरुआती फौज सेंटो डॉमिन्गो पहुंच चुकी थी। विशेषज्ञों के मुताबिक, सेंटो डॉमिन्गो में करीब 60 हजार से 85 हजार सैनिक मौजूद थे। सेना के प्रमुख को मिशन के बारे में खुफिया निर्देश दिए गए थे।
अमेरिकी इतिहासकास जेआर मैक्नील अपनी किताब, 'मॉस्कीटो एंपायर्स: इकॉलॉजी एंड वॉर इन द ग्रेटर कैरिबियन, 1620-1914' में लिखते हैं, ''नेपोलियन की योजना थी कि उनके सेना प्रमुख जनरल विक्टर इमैनुएल चार्ल्स लेक्लेर्क किसी भी तरह से सेंटो डॉमिन्गो पर फ्रांस का कब्जा बरकरार करेंगे और अर्थव्यवस्था उनके हाथ होगी और इसी तरह टॉस्सैंट की वास्तविक आजादी का अंत होगा।''
उनकी योजना ये भी थी कि दासता की प्रथा को दोबारा शुरू किया जाए लेकिन ऐसा तभी किया जाए जब काले लोग निशस्त्र कर दिए जाएं और उनके नेताओं को फ्रांस भेज दिया जाए। ऐसे में पूरी गोपनीयता बरतना भी जरूरी था।
बोनापार्ट ने लेक्लेर्क को ये भी निर्देश दिया कि टॉस्सैंट के साथ शातिराना ढंग से पेश आए। उन्होंने कहा कि लेक्लेर्क पहले टॉस्सैंट के प्रति सम्मान दिखाए और जब टॉस्सैंट अपनी सुरक्षा में ढील दे दे तब उसे पकड़ लिया जाए।
फ्रांस की अनुभवी सेना के मुकाबले में स्थानीय लड़ाके थे। ऐसे में लेक्लेर्क के लिए साल 1802 में मई महीने के अंत तक काफी ज्यादा जगह जीतना मुश्किल नहीं रहा। इसके बाद लेक्लेर्क ने हैती के इस नेता के साथ संधि की जिसके तहत टॉस्सैंट अपने इलाके में जाने के लिए राजी हो गया।
इसके एक महीने बाद टॉस्सैंट बेफिक्री के साथ लेक्लेर्क से मिलने के लिए पहुंचे जहां पर लेक्लेर्क ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद टॉस्सैंट को फ्रांस भेज दिया गया जहां पर एक साल बाद कालकोठरी में उनकी मौत हो गई।
छोटा लेकिन खतरनाक शत्रु
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि टॉन्सैंट की गिरफ्तारी जल्दबाजी में की गई हैं। क्योंकि औपनिवेशिक शक्तियों को ये पता चल गया कि टॉस्सैंट बस किसी तरह समय काटते हुए इस इंतजार में बैठा था कि फ्रांस येलो फीवर से मात खाकर वापस चला जाए।
चिकित्सा के क्षेत्र का इतिहास लिखने वाले जॉन एस मार और जॉन टी कैथी कहते हैं, "टॉस्सैंट को चिकित्सा के क्षेत्र का ज्ञान था और ये भी समझ थी कि ये बुखार कब और कहां उसके दुश्मनों पर हमला बोलेगा। ऐसा लगता कि उन्हें ये पता था कि अगर बारिश के मौसम में गोरों को बंदरगाहों और निचले इलाकों में लेकर जाया जाए तो पूरे के पूरे दस्ते खत्म हो सकते हैं।"
इस रणनीति की झलक टॉस्सैंट के लिखे उस पत्र में मिलती हैं जो उन्होंने जैक्सन डेसालाइंस को लिखा था। डेसालाइंस वो शख्स थे जो टॉन्सैंट के उत्तराधिकारी थे और औपनिवेशिकता की जंजीरें तोड़कर आजाद होने वाले हैती के पहले राष्ट्रपति बनते।
टॉस्सैंट अपने पत्र में डेसालाइंस को निर्देश देते हैं कि वह उस बंदरगाह को जला दें जहां पर फ्रांसीसियों ने गैरिसन बनाकर रखा हुआ है। वह लिखते हैं, "ये मत भूलना कि जब हम बरसात का इंतजार कर रह हैं जो कि हमें हमारे शत्रुओं से मुक्ति दिला देगी तब ऐसे समय में हमारे हथियार तोड़फोड़ और आग ही है।"
टॉस्सैंट की गणनाएँ एकदम सटीक थीं। जब साल 1802 का बारिश का मौसम शुरू हुआ तो फ्रांसीसी सेना एम्स एइग्यप्ति मच्छर की मार झेलने लगी। लेक्लेर्क ने अपने सामने खड़ी समस्याओं को उस पत्र में समझाया जो कि उन्होंने फ्रांसीसी रक्षा मंत्री डेनिस डेस्क्रेस को लिखा था।
लेक्लेर्क लिखते हैं, "कोई भी यहाँ पर अपनी जान जोखिम में डाले बिना मेहनत से काम नहीं कर सकता है। मेरे लिए यहाँ छह महीने से ज्यादा रुकना संभव नहीं है। मेरी सेहत बहुत खराब है और अगर मैं इतना भी जी पाया तो मैं खुद क खुशकिस्मत मानूँगा। मौतें होना जारी हैं और लोग बेहद डरे हुए हैं। वो सेना जिसमें 26 हजार जवान थे उसमें अब बस 12 हजार जवान शेष हैं। इस समय मेरे 36 सौ सैनिक अस्पताल में हैं। हाल ही रातों में मैंने प्रतिदिन अपने तीस से पचास सैनिकों को खोया है। हर रोज अस्पताल में 200 से 500 सैनिक जाते हैं जिनमें से बमुश्किल 50 जिंदा बाहर निकलते हैं।"
फ्रांसीसी सेना जिस तरह के माहौल जैसे भीड़भाड़ वाले बंदरगाह और जहाजों में रह रही थी, वो मच्छरों के लिए मुफीद हैं। इसके साथ ही जो लोग विदेशों से आए थे उनके अंदर इस रोग से लड़ने की क्षमता नहीं थी जैसी कि इस द्वीप पर पहले से रह रहे लोगों में थी। इस वजह से लेक्लेर्क की सैन्य टुकड़ियाँ येलो फीवर की वजह से छोटी होती गईं।
मेक्नील के मुताबिक, हैती भेजे गए फ्रांसीसी सैनिकों में से 80 से 85 फीसदी वापस नहीं आ सके। इनमें से ज्यादातर बीमारी की वजह से और कुछ युद्ध के दौरान मारे गए। जॉन एस. मार और जॉन टी. केथी के मुताबिक, "सभी मानकों को मानते हुए इस मामले में मरने वालों की संख्या और मृत्यु दर को समझना मुश्किल है जब तक कि कोई उस आदर्श जलवायु और पारिस्थितिक कारकों को न समझे जो कि किसी महामारी को पनपने में मदद करते हैं।"
इस महामारी के एक शिकार लेक्लेर्क स्वयं भी थी। साल 1802 के नवंबर महीने में लेक्लेर्क की मौत हो गई। इसके एक साल बाद फ्रांसीसी सेनाएँ आखिरकार इस द्वीप से वापस आ गईं और आधिकारिक तौर पर इस द्वीप पर कब्जा करने का अभियान त्याग दिया।"
इस हार के लिए कुछ रणनीतिक गलतियाँ जिम्मेदार रहीं। इनमें टॉस्सैंट को गिरफ्तार किया जाना, नेपोलियन का ग्वाडलुपे द्वीप पर दास व्यवस्था को वापस शुरू करने का फैसला, लेक्लेर्क के उत्तराधिकारी जनरल डोनेशियन रोचाम्बियु का बर्बर युद्ध अभियान शामिल हैं। इनकी वजह से फ्रांस को काले और मुलाट्टुस समुदाय की ओर से भारी विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन इनमें से कोई भी कारक फ्रांसीसी सेना की हार के लिए उतना जिम्मेदार नहीं था जितना कि येलो फीवर था।
नेपोलियन बोनापार्ट की ओर से सेंट डोमिनग्वे पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश के बाद दूसरी ताकतों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाना शुरू कर दिए। लेकिन सेंट डोमिनग्वे में बढ़ता रुझान एक नए और विकासशील देश के लिए चिंता का सबब बन रहा था। ये नया और विकासशील देश अमेरिका था।
साल 1800 के अंत में स्पेन ने एक गुप्त समझौते के तहत फ्रांस को लुइसियाना की एक कॉलोनी दे दी। इस कॉलोनी के तहत फ्रांस को अमेरिका में जो जमीन मिली वो वर्तमान अमेरिका के अरकान्सास, आइओवा, मिश्री, कान्सास, ओक्लाहामा, नेब्रास्का, मिनेसोटास के कुछ हिस्से, न्यू मैक्सिको, साउथ डकोटा, टेक्सास, व्योमिंग, मोन्टाना और कोलोराडो राज्य हैं। इसके साथ साथ फ्रांस को कनाडाई प्रांत अलबर्टा और सास्काचेवान भी मिल गया।
थॉमस जैफरसन सरकार इस बात को लेकर चिंतित नहीं थी कि नेपोलियन को अमेरिका में एक बड़ी जमीन मिल गई है। इसकी जगह वे इस लुइसियाना कॉलोनी के स्थान को लेकर चिंतित थे। क्योंकि अमरीकी सरकार के पास मिसिसिपी नदी और यू ओरेलेंस बंदरगाह का नियंत्रण था। और इन जगहों से अमेरिका का काफी सारा सामान जाया करता था। इसके अलावा एक चिंता ये और थी कि इस बड़े क्षेत्रफल का नया मालिक एक उभरती हुई ताकत था।
साल 1802 में लुइसियाना समझौते की खबर मिलने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति ने लिखा, "ये (समझौता) अमेरिका में सभी राजनीतिक संबंधों को बदल देता है। और इसके बाद राजनीतिक घटनाओं के एक नए युग की शुरुआत होगी।
इतिहासकार जॉन मीचम कहते हैं कि अमरीकी राष्ट्रपति ने अपनी जीवनी में लिखा - , "स्पेन उसे सालों तक अपने पास रख सकता है। इसकी फ्रांस के हाथों में जाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। फ्रांस का स्वभाव, ऊर्जा और न थकने वाला चरित्र हमारे साथ उस स्थिति में रखता है जहां से हमेशा संघर्ष चलता रहेगा। ये बिलकुल असंभव है कि फ्रांस और अमेरिका ऐसी स्थिति में होने के बाद भी दोस्त बने रहें।"
इस समस्या को जन्म लेने से पहले ही खत्म करने के विचार से जैफरसन ने जेम्स मुकरो को अपना विशेष दूत बनाकर पेरिस भेजा ताकि वे नेपोलियन से न्यू ओरेलेंस को खरीदने के लिए बात कर सकें। मुनरो ने जैफरसन का दिया काम तो कर दिया। लेकिन इसके साथ ही जैफरसन को एक खास चीज भी मिली।
दरअसल, हुआ कुछ यूं कि मुनरो जब सिर्फ न्यू ओरेलेंस की बात करने गए थे तो नेपोलियन ने न्यू ओरेलेंस देने पर तो हामी भर ही दी लेकिन उन्होंने पूरी लुइसियाना कॉलोनी ही अमेरिका को देने का प्रस्ताव रख दिया है।
लेकिन नेपोलियन ने ये कदम क्यों उठाया?
इतिहासकार मीचम बताते हैं, "फ्रांस के लिए, यूरोप से इतनी दूरस्थ जगहों को नियंत्रित करना काफी महँगा और समस्याओं से भरा होने लगा था। सेंट डोमिग्वा में दास सेनाओं से हार नेपोलियन को ज्यादा परेशान करने वाली थी। ऐसे में नेपोलियन ने अपने सभी संसाधन फ्रांस के नजदीकी क्षेत्रों में चलाए जाने वाले अभियानों पर खर्च करना उचित समझा।"
कुछ इस तरह साल 1803 के अप्रैल महीने की तीस तारीख को अमेरिका और फ्रांस के बीच समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। और अमेरिका ने मात्र 15 मिलियन अमरीकी डॉलर (वर्तमान में मात्र 340 मिलियन अमरीकी डॉलर) में फ्रांस को अपने क्षेत्र से बाहर निकालकर अपनी सीमाओं में दोगुनी बढ़ोतरी कर ली। बॉब कॉर्बेट जैसे इतिहासकार सेंट डोमिन्ग्वा को नई दुनिया विकसित करने के फ्रांसीसी विचार के केंद्र में मानते हैं। इस विचार में लुइसियाना हैती के दासों के लिए खाना पैदा करने का काम करता।
इतिहासकार हेनरी एडम्स पूछते हैं, "लेकिन द्वीपों के बिना, इस नए तंत्र के हाथ, पैर और सिर तो थे लेकिन शरीर नहीं था। ऐसे में लुइसियना की फ्रांस के लिए क्या उपयोगिता थी जब फ्रांस उसी उपनिवेश से हाथ धो बैठा था जिसके लिए लुइसियाना को खाद्य आपूर्ति करनी थी।"
अन्य शोधार्थी कुछ सबूतों के आधार पर मानते हैं कि नेपोलियन बोनापार्ट लुइसियाना पर नियंत्रण करना चाहता था और उसके बाद अमेरिका को जीतना चाहता था। या कम से कम खुद को उस क्षेत्र में एक बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता था। ऐसे में ये क्षेत्र अमेरिका, फ्रांस और स्पेन के बीच बंटा हुआ क्षेत्र होता। अगर नेपोलियन की योजना से जुड़ी इनमें से एक भी बात सही है तो सेंट डोमिंग्वा की हार ने नेपोलियन की महत्वाकांक्षाओं को खत्म कर दिया।
लुइसियाना को खरीदकर पश्चिमी ओर सीमाओं को बढ़ाने का रास्ता खुल गया। इसमें अमेरिका और मेक्सिको के बीच जंग भी शामिल है जिसमें अमेरिका ने टेक्सस और कैलिफोर्निया समेत रियो ग्रान्डे के उत्तर के भाग पर कब्जा कर लिया।
अपने क्षेत्र में विस्तार करके अमेरिका दुनिया में क्षेत्रफल के लिहाज से चौथा सबसे बड़ा देश बन गया। इसके साथ ही इसके सीमावर्ती देशों की संख्या कम हो गई। और प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर अमेरिका की ढाल बन गए। इस वजह से ही अमेरिका एक लंबे समय तक आक्रमणों से बचा रहा।
इन सभी कारकों की वजह से अमेरिका अपने आधारभूत ढाँचे और अर्थव्यवस्था को दुश्मनों से बचाने में कामयाब रहा। और ये सब इसलिए हो पाया क्योंकि येलो फीवर महामारी ने हैती में फ्रांसीसी फौज की हार में एक बड़ी भूमिका निभाई थी। ऐसे में ये साफ है कि शोधार्थी एर्विन एकेरनेक्ट इसे इतिहास की संभवत: सबसे अहम महामारी बताते हैं।