कैंसर पर बात करते हुए डॉ. बंसल बताते हैं कि कैंसर बीमारी को लेकर अभी भी बहुत जागरूकता नहीं है। कैंसर काफी हद तक इंटरनल डिफेंस/इम्यून सिस्टम पर निर्भर करता है। इसके अलावा कुछ कैंसर में इंसान की जेनेटिक प्रोफाइल भी महत्वपूर्ण है। आनुवांशिक कारणों के मुताबिक कैंसर होगा ही, यह जरूरी नहीं है।
- लंग यानी फेफड़ों के कैंसर का एक कारण कैमिकल्स, ऑटोमोबाइल्स के प्रदूषण में मौजूद हाइड्रोकार्बन्स के पार्टिकल्स होते हैं। इनसे भी कैंसर होने का ज्यादा खतरा रहता है।
- खाने को कैसे पकाया जाता है। इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है- मसलन जैसे फ्राइड, ग्रिल्ड (grilled), भूना हुआ होने से एक अलग तरह का रसायन बनता है, जिससे कैंसर होने का खतरा होता है। उबला हुआ खाना खाना सबसे ज्यादा सुरक्षित है।
- महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर यानी स्तन कैंसर का खतरा रहता है। इसके कई कारण है। शारीरिक गतिविधि की कमी, मोटापा, देर से शादी होना, स्तनपान नहीं करवाना, स्तन कैंसर की फैमिली हिस्ट्री होना इसके प्रमुख कारणों में से है।
- डॉ. बंसल ने बताया कि कि क्रोनिक हेपेटाइटिस ‘बी से लीवर सिरोसिस तथा लीवर कैंसर की आशंका बढ़ जाती है। इसे आमतौर पर जौंडिस, पेट में पानी आना, खून की उल्टी होना, काला दस्त होना, बेहोशी के लक्षणों से पहचान सकते हैं।
- इस दौरान उन्होंने बताया कि हेपेटाइटिस बी पूरे विश्व में लीवर संक्रमण का सबसे सामान्य कारण है। यह हेपेटाइटिस ‘बी वायरस के कारण होता है। यह सामान्यतया संक्रमित खून चढ़ाने से, असुरक्षित यौन संबंध से, संक्रमित माता से नवजात शिशु में होता है। लगभग सात लाख लोग प्रतिवर्ष हेपेटाइटिस ‘बी के कारण मरते हैं।अधिकतर लोग इसके संक्रमण से अनभज्ञि रहते हैं। ऐसे लोग दूसरे लोगों में हेपेटाइटिस बी के संक्रमण के खतरे को बढ़ाते हैं। इसका इलाज संभव है। इसके संभावित मरीजों को हर छह माह में अपना चेकअप अवश्य करवाना चाहिए। शराब और धूम्रपान बन्द करें। पौष्टिक भोजन करें। इसके अलावा हेपेटाइटिस 'सी' से भी लीवर कैंसर का ख़तरा बढ़ जाता है।
- धूम्रपान, गुटका, पान तम्बाकु, सौंफ सुपारी का सेवन से गले, हेड और नेक कैंसर होने का खतरा रहता है।
- लगातार शराब और वाइन के सेवन से फूड पाइप, लीवर और पेट के कैंसर का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है।
- कुछेक इलाकों में रहने से भी कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। जैसे केरल में जमीन के नीचे यूरेनियम का भंडार ज्यादा है। लिहाजा इस इलाके में रेडिएशन का खतरा ज्यादा रहता है जिससे कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
जानिए कैंसर रोग के बारे में सबकुछ
- फोटो : Amar Ujala
एस्बेस्टस (asbestos) की चादरें जहां बनती हैं, वहां काम करने वाले कर्मचारियों को कैंसर का खतरा ज्यादा रहता है, एशियन अस्पताल समूह के डॉ. प्रवीन बसंल के मुताबिक भारत में एस्बेस्टस से बनी सीमेंट की चादर बनाने का उद्योग सालाना 10 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। ग्रामीण आवास परियोजनाओं की वजह से इनकी मांग बढ़ गई है। क्योंकि इन योजनाओं में घर की कीमत को कम रखने पर जोर दिया जाता है। विश्व स्वास्थय सगंठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुमान के मुताबिक एस्बेस्टस के इस्तेमाल से होने वाली बीमारियों की वजह से हर साल 90 हजार लोगों की मौत हो जाती है।
भारत में एस्बेस्टस का विरोध कर रही 'बैन एस्बेस्टस नेटवर्क ऑफ इंडिया' के गोपाल कृष्ण कहते हैं, "हमारी मांग है कि एस्बेस्टस पर तुरंत रोक लगाई जाए, जिन इमारतों में एस्बेस्टस का इस्तेमाल किया गया है उन्हें इससे मुक्त करवाया जाए। एस्बेस्टस का असर सभी वर्गों पर हो रहा है। इससे होने वाली बीमारियों का इलाज करना मुशकिल होगा।"
डब्ल्यूएचओ ने सभी प्रकार के एस्बेस्टस को कैंसर पैदा करने वाले पदार्थों की श्रेणी मे रखा है। इसे देखते हुए कई विकसित देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है। डॉ. प्रवीन बसंल के मुताबिक एस्बेस्टस से होने वाले कैंसर और अन्य बीमारियों का पता लगाने में काफी समय लगता है और इनके इलाज में भी काफी परेशानी होती है।
महामारी की आशंका
कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीन बसंल के मुताबिक अगले एक-दो दशक में देश को कैंसर की महामारी का सामना करना पड़ सकता है। क्योंकि पश्चिम में एस्बेस्टस के संपर्क में आने से पहले सावधानी बरती जाती थी लेकिन भारत में ऐसा नहीं होता है।
डॉ. प्रवीन बसंल के मुताबिक हेपेटाइटिस बी के संक्रमण के कारण व्यक्ति को लीवर में घाव हो जाने, लीवर कैंसर होने, लीवर फेल होने, किडनी रोग होने व नसों में दिक्कत हो सकती है। हेपेटाइटिस बी की रोकथाम के लिए आप वैकसीन लगावा सकते हैं, जिसके बाद आप हेपेटाइटिस बी के संक्रमण से बच सकते हैं।
डॉ. प्रवीन बसंल के मुताबिक कैंसर को लेकर अभी भी भारत में जागरुकता की भारी कमी है, लिहाजा समय रहते इसका पता चलने और स्क्रीनिंग के शुरुआती दौर में ही कैंसर की जंग शुरू कर इसे मात दी जा सकती है। अमूमन लोग आम डॉक्टर के पास जाते हैं या फिर दिल की जांच के लिए कॉर्डियोलॉजिस्ट के पास जाते हैं, लेकिन कैंसर के डॉक्टर का रूख कभी नहीं किया जाता है। जबकि एक स्वस्थ इंसान को भी कैंसर के डॉक्टर के पास जाना चाहिए और डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
कैंसर आखिर है क्या?
एशियन अस्पताल के कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीन बंसल के मुताबिक हमारे शरीर में कोशिकाओं (सेल्स) का लगातार विभाजन होता रहता है और यह सामान्य-सी प्रक्रिया है, जिस पर शरीर का पूरा कंट्रोल रहता है। लेकिन जब शरीर के किसी खास अंग की कोशिकाओं पर शरीर का कंट्रोल नहीं रहता और वे असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं तो उसे कैंसर कहते हैं।
जैसे-जैसे कैंसर ग्रस्त कोशिकाएं बढ़ती हैं, वे ट्यूमर (गांठ) के रूप में उभर आती हैं। हालांकि हर ट्यूमर में कैंसर वाले सेल्स नहीं होते लेकिन जो ट्यूमर कैंसर ग्रस्त है, अगर उसका इलाज नहीं किया जाता है तो यह पूरे शरीर में फैल सकता है।
कैसे शुरू होता है कैंसर
डॉ. बसंल के मुताबिक कोशिका के जीन में बदलाव से कैंसर की शुरुआत होती है। जीन में बदलाव अपने आप भी हो सकता है या फिर कुछ बाहरी कारकों, मसलन तंबाकू, वायरस, अल्ट्रावाइलेट रे, रेडिएशन (एक्सरे, गामा रेज आदि) आदि की वजह से भी। अमूमन इम्यून सिस्टम ऐसी कोशिकाओं को खत्म कर देता है, लेकिन कभी-कभार कैंसर की कोशिकाएं इम्यून सिस्टम पर हावी हो जाती हैं और फिर बीमारी अपनी चपेट में ले लेती है।
ये देते हैं कैंसर को आमंत्रण
तंबाकू:
- पुरुषों में कैंसर के करीब 60 फीसदी मामले मुंह और गले के कैंसर के होते हैं और इसके बाद आता है फेफड़ों का कैंसर। इन तीनों ही कैंसर की सबसे बड़ी वजह तंबाकू है। कैंसर के कुल 40 फीसदी मामले तंबाकू की वजह से होते हैं, फिर चाहे पीनेवाला तंबाकू (सिगरेट, बीड़ी, हुक्का आदि) हो या फिर खाने वाला (गुटखा, पान मसाला आदि)।
शराब:
- ज्यादा शराब पीना भी खतरनाक है। ज्यादा शराब पीने से मुंह, खाने की नली, गले, लिवर और ब्रेस्ट कैंसर की आशंका बढ़ जाती है। अल्कॉहल और साथ में तंबाकू का सेवन कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ा देता है।
मोटापा:
- अगर किसी के शरीर में फैट बढ़ जाता है तो उसका वजन बढ़ जाता है। इस फैट में मौजूद एंजाइम मेल हॉर्मोन को फीमेल हॉर्मोन एस्ट्रोजिन में बदल देते हैं। फीमेल हॉर्मोन ज्यादा बढ़ने पर ब्लड कैंसर, प्रोस्टेट, ब्रेस्ट कैंसर और सर्विक्स (यूटरस) कैंसर होने की आशंका बढ़ जाती है। हाई कैलरी, जंक फूड, नॉन-वेज ज्यादा लेने से समस्या बढ़ जाती है।
संक्रमण:
- हेपटाइटिस बी, हेपटाइटिस सी, एचपीवी (ह्यूमन पैपिलोमावायरस) जैसे इन्फेक्शन कैंसर की वजह बन सकते हैं। हेपटाइटिस सी के इन्फेक्शन से लिवर कैंसर और एचपीवी से महिलाओं में सर्वाइकल और पुरुषों में मुंह का कैंसर हो सकता है। ये वायरस असुरक्षित सेक्स संबंधों से फैलते हैं।
फैमिली हिस्ट्री या आनुवांशिक:
- पैरंट्स या दादा-दादी, नाना-नानी आदि को कैंसर हुआ है तो अगली पीढ़ी को कैंसर होने के चांस करीब 10 फीसदी तक बढ़ जाते हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि अगर मां या पिता को कैंसर हुआ है तो बच्चे को होगा ही।
फिजिकली एक्टिव न रहना:
- फिजिकल एक्टिविटी या एक्सरसाइज न करने से कैंसर की आशंका बढ़ जाती है। रोजाना कम-से-कम 30 मिनट एक्सरसाइज जरूर करें। हालांकि 45-60 मिनट एक्सरसाइज करना बेहतर है। इसमें कार्डियो एक्सरसाइज (ब्रिस्क वॉक, जॉगिंग, साइक्लिंग, स्वीमिंग आदि ) को जरूर शामिल करें।
ऐसा क्या करें कि कैंसर आपके पास फटके भी नहीं
सही खानपान:
- जब भी आप प्राकृतिक और सामान्य चीजें खाते हैं तो आप भी तंदुरुस्त ही रहते हैं। पैक्ड फूड, प्रिजर्व्ड फूड, फास्ट फूड (जो सामान्य फूड नहीं हैं) आदि में ऐसी चीजें मिलाई जाती हैं जो दिखने में तो ताजा होती हैं, लेकिन हकीकत में ये बासी होती हैं। इन्हें केमिकल मिलाकर ताजा किया जाता है। ऐसी चीजें न खाएं। साथ ही बिन मौसम फल और सब्जियां भी न लें। नॉनवेज खाने में परहेज करें खासकर रेड एवं प्रोसेस्ड मीट के सेवन से बचें। सेहतमंद फैट चुनें जैसे बटर एवं सैचुरेटेड फैट्स के बजाय ओलिव ऑयल चुनें। ढेर सारा पानी पीएं, इससे कैंसर कारक तत्व यूरीन के साथ बाहर निकलते हैं और कैंसर की आशंका कम हो जाती है।
दुरुस्त लाइफस्टाइल:
- हम बचपन से जिस तरह जीते आए हैं, उसी तरह आगे भी जीना चाहिए। ऐसा न हो कि गांव से या छोटे शहरों आने पर या दूसरों की देखा-देखी अपनी अच्छी आदतों को भी बदल लें। अगर हमें सुबह जल्दी उठने और पार्क या फील्ड में जाने की आदत है तो उसे देर रात तक जागने में न बदलें।
मानसिक शांति:
- मानसिक शांति की कमी आज सबसे ज्यादा है। लोग तनाव में ही जीने लगे हैं। फेसबुक, वट्सऐप आदि के चक्कर में हम अपना चैन खो देते हैं। ग्रुप में साथ बैठने पर भी लोग आपस में बातें नहीं करते, बस अपने मोबाइल में लगे रहते हैं और इंटरनेट की गुलामी करते हैं। अगर हम अपनी भावनाएं दूसरों से साझा नहीं करते तो हमारे अंदर ऐसे फ्री ऑक्सिडेटिव रेडिकल्स बनने लगते हैं जो धीरे-धीरे शरीर में जमा होने के बाद जीन्स को ही नुकसान पहुंचाते हैं। मानसिक शांति के लिए योग, ध्यान, संगीत का सहारा लें। परिवार, दोस्तों, रिश्तेदारों के साथ घुलमिल कर रहें।