अगर पेट भरा होने के बाद भी खुद को खाने से नहीं रोक पाते, तो आप इमोशनल ईटिंग के शिकार हैं। इस दौरान जब आप खाते हैं, तो अपनी भूख नहीं भावनाओं को शांत करने के लिए खाते हैं।
यह सही है कि इंसान इतनी भागदौड़ पेट के लिए ही करता है। लेकिन, कोई जरूरत से कुछ ज्यादा ही खाने लगे, तो समझ लीजिए कि मामला ईटिंग डिस्ऑर्डर का है।
ज्यादातर लोगों को लगता है कि इमोशनल ईटिंग का कारण खुद पर कंट्रोल नहीं होना है। हालांकि, न्यूट्रिशनिस्ट किरण दीवान के मुताबिक ′खाने से जुड़े इस डिस्ऑर्डर की वजहें और इलाज साइकोलॉजी में छिपे हैं।
इमोशनल ईटिंग का मामला अनुशासन से जुड़ा है, अगर सही मील-प्लानिंग करके उस पर दृढ़ता से अमल करें, तो इमोशनल ईटिंग से बचा जा सकता है।′
इमोशनल ईंटिंग के कारण
ऑफिस की टेंशन, काम का तनाव और भागदौड़ भरी जिंदगी से अपने दिलो-दिमाग को थोड़ी देर अलग रखने के लिए लोग बेहिसाब खाने लगते हैं और इस तरह वो इमोशनल ईटिंग का शिकार बन जाते हैं।
अमेरिकी जरनल क्लिनीकल न्यूट्रीशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादा काम के कारण थके हुए लोग भी इमोशनल ईटिंग का शिकार हो जाते हैं।
तनाव, गुस्सा और थकान होने पर भी लोग खाने की तरफ रुख करते हैं। तनाव या भावनात्मक अस्थिरता के कारण हमेशा भूख लगी होती है और लोग खाना तब तक बंद नहीं करते जब तक प्लेट में रखा खाना खत्म नहीं हो जाए।
जबकि इमोशनल ईंटिंग की यह आदत स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक साबित हो सकती है।
क्यों होता है ऐसा
हर बार गम, खुशी, गुस्सा, अकेलापन, थकान या ऊब होने पर फ्रिज की ओर लपकना अच्छी आदत नहीं है। यह दरअसल, आपके पेट के भूख नहीं है, बल्कि अपनी उमड़ती भावनाओं को शांत करने के लिए आप जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं।
किरण दीवान के मुताबिक भावनात्मक भूख को भोजन से नहीं मिटाया जा सकता। इमोशनल ईटिंग से आपको भले ही कुछ पल के लिए संतुष्टि मिलती हो, लेकिन ज्यादा खा लेने और जरूरत से ज्यादा कैलोरी उपभोग करने की ग्लानि भी कम नहीं होती।