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Coronavirus Vaccine: रूस की कोरोना वैक्सीन पर कितना भरोसा? जानिए क्या कहते हैं भारतीय विशेषज्ञ

Tue, 08 Sep 2020 12:02 AM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Coronavirus vaccine updates - फोटो : Pixabay/Amarujala
भारत में कोरोना वैक्सीन के नए मामले रोज नया रिकॉर्ड बना रहे हैं। अब एक दिन में 90 हजार से ज्यादा मामले सामने आए हैं और दुनिया में अमेरिका के बाद कोरोना संक्रमण के सबसे ज्यादा मरीज भारत में ही हैं। ऐसे में लोगों से ज्यादा सरकार को कोरोना के वैक्सीन की चिंता सता रही है। इन सब खबरों के बीच रूस की वैक्सीन स्पुतनिक-वी एक उम्मीद की किरण बन कर सामने आई है, लेकिन वाकई में क्या रूस की वैक्सीन पर उतना भरोसा किया जा सकता है। 

रूस के वैज्ञानिकों ने कोरोना की वैक्सीन को लेकर पहली रिपोर्ट प्रकाशित की है। रिपोर्ट में कहा गया है पहले फेज के ट्रायल में इम्यून रेस्पॉन्स अच्छा दिखा है। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद से दुनियाभर से वैज्ञानिकों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। मेडिकल जर्नल दि लैंसेट में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि इस ट्रायल में हिस्सा लेने वाले सभी लोगों में कोरोना से लड़ने वाली एंटीबॉडी विकसित हुई और किसी में भी कोई भयानक साइड इफेक्ट देखने को नहीं मिला। 




 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
रूस में इस वैक्सीन को अगस्त के महीने में ही बिना डेटा जारी किए लाइसेंस दिया गया था। इसके साथ ही रूस ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया था। वैक्सीन के जानकारों के मुताबिक, रूस के वैक्सीन ट्रायल का डेटा उसकी प्रमाणिकता और सेफ्टी को साबित करने के लिए बहुत ही छोटा है। जारी की गई इस नई रिपोर्ट को रूस के आलोचकों के मुंह बंद करने की कवायद के रूप में भी देखा जा रहा है। पश्चिमी देशों के कई एक्सपर्ट की राय में रूस के वैज्ञानिक ट्रायल के दौरान कुछ जरूरी चरणों को पूरा किए बिना आगे बढ़ जा रहे हैं। 

अगस्त के महीने में सिर्फ दो महीने के ट्रायल के बाद रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने दावा किया है कि उनके वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस की ऐसी वैक्सीन तैयार कर ली है, जो कोरोना वायरस के खिलाफ कारगर है। गमलेया इंस्टीट्यूट में विकसित इस वैक्सीन के बारे में उन्होंने कहा कि उनकी बेटी को भी यह टीका लगा है। रूस ने इस वैक्सीन का नाम 'स्पुतनिक वी' दिया है। रूसी भाषा में 'स्पुतनिक' शब्द का अर्थ होता है सैटेलाइट। रूस ने ही विश्व का पहला सैटेलाइट बनाया था। उसका नाम भी स्पुतनिक ही रखा था। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दि लैंसेट की रिपोर्ट में क्या कहा गया है?

दि लैंसेट की रिपोर्ट के मुताबिक, रूसी वैक्सीन स्पुतनिक-वी के दो ट्रायल जून और जुलाई में किए गए थे। दोनों ही ट्रायल के दौरान 38 स्वस्थ वॉलेंटियर को टीके लगाए गए। फिर तीन हफ्ते बाद उन्हें दोबारा बूस्टर डोज लगाए गए। ये सभी वॉलेंटियर 18 साल से 60 साल की उम्र वाले थे। इनको 42 दिनों तक निगरानी में रखा गया। तीन हफ्तों के अंदर इन वॉलेंटियर्स में एंटीबॉडी विकसित हो गई। इन वॉलेंटियर्स में सिर दर्द और जोड़ों में दर्द के अलावा कोई गंभीर साइड इफेक्ट नहीं देखा गया। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
रिपोर्ट के मुताबिक, ये रैंडम ट्रायल नहीं थे। मतलब ये कि जिन वॉलेंटियर को ये टीके लगाए गए उन सबको पता था कि उन्हें टीके लगाए जा रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि अब लंबे समय की स्टडी की जरूरत है ताकि कोरोना के खिलाफ ये वैक्सीन सेफ्टी के साथ साथ कितनी प्रभावशाली है, इसका भी पता लगाया जा सके। तीसरे चरण के ट्रायल के लिए अलग-अलग आयु वर्ग और अलग-अलग रिस्क ग्रुप के साथ 40 हजार लोगों पर इसका परीक्षण किए जाने की बात इस रिपोर्ट में कही गई है। इस वैक्सीन में इम्यून रेस्पॉन्स को जेनरेट करने के लिए अडीनोवायरस (adenovirus) की अडेप्टिव स्ट्रेन का इस्तेमाल किया गया है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अभी लंबा सफर तय करना बाकी है

बीबीसी की स्वास्थ्य संवाददाता फिलिपा रॉक्स्बी के मुताबिक, ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने रूसी वैक्सीन के लिए 'उत्साहजनक' और 'अब तक एक अच्छी खबर' है, जैसे विशेषणों का इस्तेमाल किया है। उनके मुताबिक अभी इस वैक्सीन को लंबा सफर तय करना है। फेज-2 के ट्रायल में एंटीबॉडी रेस्पॉन्स का मतलब ये नहीं कि वायरस से बचाव में इसकी प्रामाणिकता भी साबित हो गई है। अब तक बस इतना साबित हुआ है कि 18 साल से 60 साल की उम्र वालों में 42 दिन के लिए ये वैक्सीन कोरोना से सुरक्षित रखती है, लेकिन क्या 42 दिन के बाद ये वैक्सीन कारगर साबित होगी?

60 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्गों में इसका क्या असर होगा? जिन लोगों को पहले से कोई दूसरी बीमारी है उन लोगों में इस वैक्सीन का कितना असर होगा? ऐसे कई सवाल हैं जिनके बारे में इस रिपोर्ट में कुछ भी नहीं कहा गया है। ऐसी तमाम जानकारी हासिल करने के लिए एक बड़े ग्रुप में 'रैंडमाइज्ड ट्रायल' की जरूरत पड़ेगी, जिसमें किसी को इस बात की जानकारी न हो कि उन्हें कोरोना से बचाव के लिए टीका दिया गया है या फिर कोई डमी टीका दिया गया है। इस तरह के ट्रायल के लिए लंबा वक्त लगता है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
तीसरे चरण के ट्रायल में ज्यादा खुलेपन और पारदर्शिता की जरूरत होगी। दुनिया में जितने वैक्सीन के ट्रायल चल रहे हैं, उनमें से शायद कुछ ऐसे होंगे जो किसी खास परिस्थिति में ज्यादा बेहतर काम करेंगे। इसलिए कौन सी वैक्सीन किस परिस्थिति में बेहतर काम करती है, किन पर उसका असर ज्यादा अच्छा होता है, ये जाने बिना नहीं कहा जा सकता कि सभी वैक्सीन हर व्यक्ति के लिए असरदार होगी। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
भारत की प्रतिक्रिया

भारत में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद यानी सीएसआईआर ही वो संस्था है जो वैक्सीन के लिए दुनियाभर में हो रही कवायद पर नजर बनाए हुए है और भारत सरकार को अपने सुझाव देती है। सीएसआईआर के महानिदेशक शेखर मांडे ने कहा कि दि लैंसेट की रिपोर्ट तो सही है, सुरक्षा के लिहाज से रूस की वैक्सीन में कोई दिक्कत नहीं दिख रही। किसी भी टीके के प्रयोग में सेफ्टी ही मुख्य रूप से चिंता की बात होती है। जाहिर है इस रिपोर्ट के बाद, सेफ्टी पर हमें चिंतित होने की जरूरत नहीं है, लेकिन टीके के प्रयोग में दूसरी चिंता प्रोटेक्शन यानी बचाव की होती है। अभी स्पुतनिक-वी टीके के बारे में यह जानकारी नहीं है कि उससे कोरोना वायरस से कितने लंबे समय तक बचा जा सकता है। बचाव के नतीजों के लिए हमें और इंतजार करना होगा। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दरअसल किसी भी टीके के इस्तेमाल की इजाजत से पहले 'सुरक्षा और बचाव' इन दोनों पैमानों पर उनसे नापना जरूरी होता है। फेज 1 और 2 के ट्रायल में टीका लगने पर लोगों में कोई दिक्कत या कोई साइड इफेक्ट तो नहीं हो रहा, ये पता लगाया जाता है। लेकिन कोरोना से बचाव का यही तरीका सही है- इसका पता लगाने के लिए थोड़ा लंबा वक्त लगता है। भारत में कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फेज 1 और 2 के ट्रायल रूस में होने के बाद स्पुतनिक-वी के तीसरे चरण का ट्रायल भारत में करने की तैयारी सरकार द्वारा की जा रही है। 

इस बारे में शेखर मांडे से सवाल पूछने पर उन्होंने कहा कि ऐसा हो भी सकता है, लेकिन इस बात की उन्हें पुख्ता जानकारी नहीं है। इस बारे में भारत सरकार की संस्था ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ही फैसला ले सकती है। बीबीसी ने डीसीजीआई को भी इस बारे में ई-मेल कर सवाल पूछा है, लेकिन उनका कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। यहां ये जानना जरूरी है कि केंद्र सरकार ने वैक्सीन के ट्रायल और किस देश से भारत को वैक्सीन खरीदने की जरूरत है और कब किन परिस्थितियों में भारत वैक्सीन खरीदेगा, इसके लिए एक अलग से कमेटी बनाई है। दुनियाभर के वैक्सीन पर चल रही तमाम कवायद पर उनकी नजर है और भारत में भी तीन वैक्सीन के ट्रायल उन्हीं की निगरानी में हो रहे हैं। 

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI
विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रतिक्रिया?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, दुनियाभर में 176 देशों में कोरोना की वैक्सीन बनाने की कवायद चल रही है, जिसमें से 34 का ह्यूमन ट्रायल चल रहा है। आठ ऐसे वैक्सीन है जो ट्रायल के तीसरे चरण में पहुंच चुके हैं, जिसे सबसे एडवांस स्टेज माना जाता है। इसमें सबसे लंबा वक्त भी लगता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि साल 2021 में ही कोरोना का टीका आम जनता के लिए उपलब्ध होगा। 

इसके पहले अगस्त के महीने में जब रूसी वैक्सीन को वहां की सरकार से लाइसेंस मिला था, तब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा था कि उसके पास अभी तक रूस के जरिए विकसित किए जा रहे कोरोना वैक्सीन के बारे में जानकारी नहीं है कि वो इसका मूल्यांकन करें। खुद रूस में भी इन दावों पर सवाल उठ रहे हैं। मॉस्को स्थित एसोसिएशन ऑफ क्लीनिकल ट्रायल्स ऑर्गेनाइजेशन (एक्टो) ने रूस सरकार से इस वैक्सीन की स्वीकृति प्रक्रिया को टालने की गुजारिश की है। उनके मुताबिक जब तक इस वैक्सीन के फेज तीन के ट्रायल के नतीजे सामने नहीं आ जाते, तब तक रूस की सरकार को इसे मंजूरी नहीं देनी चाहिए। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
एक्टो नाम के इस एसोसिएशन में विश्व की शीर्ष ड्रग कंपनियों का प्रतिनिधित्व है। एक्टो के एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर स्वेतलाना जाविडोवा नें रूस की मेडिकल पोर्टल साइट से कहा है कि बड़े पैमाने पर टीकाकरण का फैसला 76 लोगों पर इस वैक्सीन के ट्रायल के बाद लिया गया है। इतने छोटे सैम्पल साइज पर आजमाए गए टीके की सफलता की पुष्टि बहुत ही मुश्किल है। किरिल दिमित्रीव, रूसी इंवेस्टमेंट फंड के हेड हैं, जो स्पुतनिक-वी बनाने में लगी है। उन्होंने एक संवाददाता सम्मेलन में बताया ये रिपोर्ट उन आलोचकों के लिए एक प्रभावशाली रेस्पॉन्स है, जो रूसी वैक्सीन की निंदा कर रहे थे। 
उन्होंने बताया कि 3000 वॉलेंटियर को अगले फेज के लिए नियुक्त कर लिया गया है। रूस के स्वास्थ्य मंत्री के मुताबिक, नवंबर या फिर दिसंबर में वैक्सीन देने का काम शुरू किया जाएगा। शुरुआत में उनकी प्राथमिकता हाई-रिस्क ग्रुप को पहले देने की होगी, लेकिन एक्सपर्ट की राय है कि बाजार में इस वैक्सीन को उतारने में अभी लंबा वक्त लग सकता है। 
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