डाॅ. अजय बंग
- फोटो : amar ujala samwad
सेहत की भारतीय व्याख्या क्या है?
जो स्व में निर्भर है, वह स्वस्थ है। भारत में सेहत की व्याख्या है जो अन्य किसी पर निर्भर नहीं है, वह स्वस्थ है। यह व्याख्या महात्मा गांधी के पोते ने डॉ. अभय बंग ने सिखाई थी।
ग्रामीण स्वास्थ्य की चार प्रमुख समस्या
एक आदिवासी क्षेत्र गढ़चिरौली, जिसे महाराष्ट्र का कालीपानी माना जाता था, में पहुंचकर डाॅ. अजय बंग की टीम ने वहां लोगों से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बारे में जाना। यहां के ग्रामीण लोगों ने चार प्रमुख स्वास्थ्य समस्याएं बताईं। 50 गांवों के लोगों ने 35 साल पहले ये चार समस्याएं बताईं।
पहला, नवजात शिशु की मृत्यु
दूसरा, पुरुष शराब पीके पड़े रहते हैं
तीसरा, महिलाओं को बहुत कमजोरी है
चौथी, दिनभर काम करने के बाद पीठ, कमर और जोड़ों में दर्द रहता है।
पहली समस्या को डॉ. बंग ने खुद अनुभव किया। उन्होंने बताया कि अगस्त के महीना था। उनका अस्पताल जंगल में था। मरीज देखकर शाम को वह जब घर लौटकर थके होने के कारण बेड पर लेट गए। बड़ी तेज बारिश चल रही थी। अचानक दरवाजे पर खटखटाहट हुई। डॉ. बंग उठे और दरवाजा खोला तो दो औरतें घर में घुस गईं। एक बूढ़ी औरत थी और दूसरी उसकी लड़की जो कि करीब 25 साल की होगी। उसकी गोद में एक छोटा सा शिशु था। डॉक्टर ने बच्चे के बेड पर लेटाकर जांच शुरू की लेकिन बच्चे ने उन्हें सिर्फ तीस सेकंड दिए। वह सोच ही रहे थे कि नवजात शिशु है, निमोनिया हो गया है, डिहाइड्रेशन हो गया है, इसके आगे कुछ समझ पाता, उससे पहले ही बच्चे की मौत हो गई।
बाल मृत्यु के साक्षी
उन्होंने कहा कि जब मेरे ही बेड पर एक बच्चे की मौत होती है तो बाल मृत्यु क्या होती है इसका साक्षात दर्शन होता है। उस मां और नानी को जब पूछा तो पास के चार किमी दूर के गांव से थे। लेकिन बच्चे को समय पर अस्पताल नहीं ला पाए। इसका मतलब ये है कि जंगल में अस्पताल भी खोल रहे हैं, फिर भी बच्चे को मेडिकल केयर समय पर न मिल पाने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना से यह बात समझ में आई कि जिन्हें मेडिकल सेवा नहीं मिल पाती, उनके पास मेडिकल सेवा पहुंचाओ।
आरोग्य स्वराज की शुरुआत
आरोग्य स्वराज्य के जरिए उन्होंने गांव-गांव तक स्किल पहुंचाई। गांव-गांव की औरतों को चुनकर एक महीने की ट्रेनिंग दीं। उनके हाथ में दवाई दी,नवजात शिशु को कैसे जांचें, क्या इलाज दें। 39 गांव में 39 महिलाएं, जिन्हें आरोग्य दूत माना, बाकी 37 गांव में सरकारी कार्यक्रम चले। जिन औरतों को हमने आरोग्य दूत बनाया था, उन गांवों में तीन साल में शिशु दर कम हुई। परिणाम ये हुआ कि पहले जहां 1000 बच्चों में से एक साल में 121 बच्चे मर जाया करते थे, वो 30 तक आ गया।
इसके अलावा डॉ. बंग ने दिल्ली की आॅल इंडिया इंस्टीट्यूट के चेयरमैन ऑफ पियेड्रिक ने इन औरतों की तीन दिन की परीक्षा ली। और परिणाम में बताया कि जितना ये महिलाएं जानती हैं, उतना एम्स के डॉक्टर भी नहीं जानते हैं।
गढ़चिरौली में 30 वर्ष में शराब पीने वाले की संख्या घटी'
ग्रामीणों ने जो अपनी दूसरी समस्या बताई थी, वह यह थी कि पुरुष शराब पीकर पड़े रहते हैं, इस समस्या को हल करने के लिए पिछले 30 साल से शराब के खिलाफ इतना आंदोलन चला कि अब स्थिति ऐसी है, पहले सर्वे में 70 फीसदी पुरुष पीते थे। अब 24 फीसदी पुरुष ही शराब पीते हैं। हर साल जिले का 100 करोड़ रुपये शराब का बचता है। डॉ. बंग ने कहा कि गढ़चिरौली में 30 वर्ष में शराब पीने वाले की संख्या घटी है।
डाॅ. अभय बंग
- फोटो : Amar ujala samwad
भारत की स्वास्थ्य समस्याएं
देश में 11 करोड़ आदिवासी हैं। यह संख्या इतनी अधिक है कि दुनिया की 10वें नंबर का अलग देश बन सकता है। WHO की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 51 प्रतिशत पुरुष शरब पीते हैं। भारत में कुपोषण, मलेरिया, टीबी लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा कई असंक्रामक बीमारियां जैसे डायबिटीज, हृदय रोग, बीपी जैसी समस्याएं भी भारत में तेजी से बढ़ रही है। इन समस्याओं के लिए बड़े बड़े अस्पताल हैं। हालांकि इन समस्याओं के लिए जितनी बड़ी-बड़ी तकनीक हैं, उतनी खर्चीली भी है।।
अमेरिकन मेडिकल एक्यूरेट मॉडल
अमेरिका के मेडिकल केयर की हालत को समझिए, अमेरिका में हर साल प्रति व्यक्ति 10000 डॉलर मेडिकल खर्च है। आज अमेरिका में 10 प्रतिशत मेडिकल केयर पीआर में खर्चा आता है। भारत का जीडीपी 2800 डॉलर है और मेडिकल केयर में भारत चार प्रतिशत खर्च करता है। जबकि अमेरिका 58 प्रतिशत खर्च करता है। इसलिए हमारे लिए अमेरिका का एक्यूरेट मॉडल काम का नहीं, लेकिन भारत ने अपना मॉडल तलाशा, आरोग्य स्वराज। इस मॉडल को अपनाने के लिए जीवनशैली में बदलाव की जरूरत होती है।
खाने की थाली से होती है स्वस्थ रहने की लड़ाई
खाने की थाली को हमारा कुरुक्षेत्र समझ सकते हैं। जीवनशैली में बदलाव लाना होगा। व्यायाम और योग को अमल में लाना होगा। गांव-गांव में जाकर आशा (महिलाएं) और अशोक (पुरुष) की आर्मी खड़ी करनी पड़ेगी। राष्ट्रीय नीति के अनुसार, सरकार को स्वास्थ्य पर ढाई फीसदी खर्च करना होता है, हालांकि सब मिलाकर सरकार दो फीसदी ही खर्च कर पाती है। इसे बढ़ाकर पहले ढाई फीसदी और फिर विकसित भारत की नीति के अनुसार 10 फीसदी करनी होगी। सरकार को इसके लिए खर्च कम और लोगों को स्वावलंबी बनाना होगा।
आदिवासी क्यों नहीं जाते हैं अस्पताल?
गढ़चिरौली के आदिवासियों से पूछा गया कि अस्पताल क्यों नहीं जाते हो, तो उन्होंने कहा कि अस्पताल की बड़ी-बड़ी इमारतों में वे खो जाते हैं। दूसरा कारण है कि डॉक्टर और नर्स सफेद कपड़ों में नजर आते हैं। हमारे यहां मुर्दों को सफेद कपड़ों में लपेटा जाता है, वहां जान बचाने वाले ही सफेद कपड़ों में होते हैं। तीसरा कारण है कि वहां मरीज को तो ले लेते हैं, लेकिन उसके परिवार को बाहर निकाल देते हैं। चौथा कारण है कि अस्पतालों में डॉक्टर खुद को भगवान समझते हैं, वहां भगवान नहीं हैं, सिर्फ डॉक्टर हैं जो खुद को भगवान मानते हैं।
इसलिए डाॅ. बंग ने जब आदिवासी क्षेत्र में पहला अस्पताल बनाया,उसे झोपड़ी में बनाया। उनका विश्वास बढ़ाने के लिए अस्पताल के बाहर उनकी इष्ट देवी का मंदिर बना दिया। गांव गांव के आदिवासियों ने आसपास अपने गांव के लिए झोपड़ी बनाई कि जब उनके गांव के मरीज आएंगे तो यहां रह सकेंगे। सबसे बड़ी समस्या होती है कि अस्पताल का बिल बहुत आएगा, इसपर भी काम किया ताकि वह मेडिकल केयर लेने की हिम्मत कर सकें।
डाॅ. बंग ने बताया स्वस्थ कैसे रहना है, 49 साल की उम्र में पहला हार्ट अटैक आया वो भी गढ़चिरौली के जंगलों में। लेकिन अपनी सेहत को नजरअंदाज करने के कारण ऐसा हुआ। पांच साल मैं यह सोचने लगा कि मौत से कैसे बचें और हृदय रोग से बचने के लिए क्या करना है।
जिंदगी एक ही बार मिलती है। इतनी अमूल्य चीज को सिर्फ पैसा कमाने के लिए बर्बाद न करें। एक जिंदगी का बेवकूफी सौदा न करिए, बल्कि अर्थपूर्ण जीवन अपनाइए।