वायु प्रदूषण से होने वाली समस्याएं
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जहरीली गैसें और हवा में घुलता जहर
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर में हर साल लगभग 70 लाख लोग प्रदूषित हवा में सांस लेने की वजह से समय से पहले मौत के शिकार हो जाते हैं। इसमें बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी शामिल हैं। धूल, धुआं, फैक्ट्रियों और गाड़ियों से निकलने वाली जहरीली गैसें, यहां तक कि घरों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन भी हमारे फेफड़ों पर बोझ डालते हैं।
यह प्रदूषित हवा धीरे-धीरे शरीर में घुसकर अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का कैंसर, दिल की बीमारी और यहां तक कि स्ट्रोक तक का खतरा बढ़ा देती है। गांव हो या शहर, प्रदूषण का खतरा हर जगह देखा जा रहा है।
प्रदूषित हवा में सांस लेना सेहत के लिए खतरनाक
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अध्ययन में क्या पता चला?
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और स्टॉकहोम एनवायरनमेंट इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया यह विश्लेषण तेल और गैस आपूर्ति श्रृंखला के प्रत्येक चरण से उत्पन्न स्वास्थ्य प्रभावों को जांचने वाला पहला अध्ययन है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में शोधकर्ता करण वोहरा कहते हैं, हम लंबे समय से जानते हैं कि दुनिया की एक बड़ी आबादी प्रदूषण के गंभीर खतरे में जी रही है।
साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित इस विश्लेषण के लिए, लेखकों ने संघीय सरकार और कोलोराडो बोल्डर विश्वविद्यालय के आंकड़ों का उपयोग करते हुए तेल और गैस उत्पादन और उपयोग के प्रत्येक चरण की एक सूची तैयार की।
वायु प्रदूषण के गंभीर साइड-इफेक्ट्स
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सूक्ष्म कणीय प्रदूषण संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए खतरनाक
लेखकों पाया कि अमेरिका में वायु प्रदूषण के कारण होने वाले स्वास्थ्य प्रभावों में तेल और गैस की बड़ी भूमिका है। सूक्ष्म कणीय प्रदूषण बच्चों के समय से पहले जन्म का कारण बन रहे हैं वहीं नाइट्रोजन डाइऑक्साइड प्रदूषण बच्चों में अस्थमा के नए मामलों में से 90% मामलों के लिए जिम्मेदार हैं।
इंफ्लेमेशन से लेकर कैंसर तक का भी खतरा
वायु प्रदूषण श्वसन संबंधित समस्याओं का प्रमुख कारण है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, वायु प्रदूषण हर साल लगभग 70 लाख लोगों की जान लेता है। इसमें फेफड़े सबसे पहले प्रभावित होते हैं। प्रदूषित हवा में मौजूद PM2.5 और NO₂ जैसी सूक्ष्म कणिकाएं सांस के जरिए फेफड़ों में जाकर सूजन और कैंसर तक पैदा कर सकती हैं।
इसी तरह लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के मुताबिक, लकड़ी, गोबर या कोयले से खाना बनाने वाले घरों में रहने वालों को क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) का खतरा 4 गुना तक बढ़ जाता है। यह धुआं फेफड़ों की वायुमार्ग को नुकसान पहुंचाता है और सांस लेने की क्षमता को कमजोर बना देता है।
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स्रोत
Fossil fuel racism in the United States: How phasing out coal, oil, and gas can protect communities
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