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मानसिक रूप से बीमार बना रहा है घर का अकेलापन, क्या कहते हैं विशेषज्ञ

Thu, 26 Mar 2020 08:48 PM IST
नवनीत राठौर लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : फाइल फोटो
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अपने आने वाले पहले बच्चे को लेकर रितिका सिंह जितनी उत्साहित हैं उससे कहीं ज्यादा चिंतित भी हैं। उनको इस बात का डर है कि कहीं वो अपने अजन्मे बच्चे को कोरोना वायरस से संक्रमित न कर दें। यह डर उनके दिमाग में कुछ इस तरह समाया हुआ है कि वो पूरी रात सो नहीं पा रही हैं। जहां करोड़ों भारतीय अगले तीन हफ्तों के लॉकडाउन में खुद को दुनिया से आइसोलेट करते हुए घरों में है वहीं इनमें से एक 26 वर्षीय रितिका भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपने विचारों से जूझ रही हैं।

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विशेषज्ञों की मानें तो मन के चक्रव्यूह से बाहर निकलने का रास्ता उतना ही सरल है जितना अपने दिनचर्या का पालन करना। इसके लिए आप मामलों की संख्या और घटनाओं पर न ध्यान देते हुए घर पर मेडिटेशन और योगा करें। रितिका झांसी में एक सरकारी कर्मचारी हैं और फिलहाल मातृत्व अवकाश पर अपने माता-पिता के साथ वाराणसी में हैं। उनका कहना है कि हालात ऐसे हैं कि बोरियत भरे दिन तो गुजर जाते हैं लेकिन रातों को काटना वास्तव में घबराहट और असहायता के साथ मुश्किल होती है।

"वैसे तो गर्भवस्था का लंबा महीना कई तरह के अलग-अलग भावनाओं से भरा होता है। रात में बिस्तर पर जाने के बाद मुझे नींद नहीं आती है। मैं सिर्फ यहीं सोचते रहती हूं अगर मैं कोरोना से संक्रमित होकर वायरस को बच्चे तक पहुंचा दूं तो क्या होगा?" रितिका ने फोन पर पीटीआई को बताया।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक सामाजिक दूरियों के कारण लोग भविष्य के बारे में चिंता, तनाव, हाइपोकॉन्ड्रिआसिस और अनिश्चितता का अनुभव कर सकते हैं। यह दूरियां केवल एक उहापोह ही नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी को दुखी कर देती हैं।

सर गंगाराम हॉस्पिटल में मनोचिकित्सक सलाहकार राजीव मेहता कहते हैं कि रोगभ्रम यानी हाइपोकॉन्ड्रिआसिस में लोग किसी विचार के साथ बहुत ज्यादा गंभीर हो जाते हैं और इसका कोई इलाज नहीं है। मैंने अपने क्लिनिक में ऐसे कई मामले देखें, जहां लोग बिना किसी लक्षण के कोरोना वायरस की जांच करवाने पर जोर दे रहे हैं।

मुंबई के लीलावती अस्पताल में मनोचिकित्सक सलाहकार विहंग एन वाहिया कहते हैं कि लोगों को वास्तव में समझ नहीं पाते हैं कि सोशल डिस्टेंसिंग का मतलब क्या होता है? ऐसे लोग जो अकेलेपन को सहन नहीं कर सकते हैं और जिनके पास अपनी समस्याओं को साझा करने के लिए कोई नहीं है, वे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं क्योंकि वे ऐसी स्थिति में किसी से भी नहीं मिल सकते हैं। समाचार में जब भी लोग संक्रमित लोगों की बढ़ती संख्या देखते हैं तो लोगों में दहशत फैल जाती है। ऐसे में ज्यादा सोचने वाले लोग भी बीमार पड़ जाते हैं।  

उन्होंने कहा कि बहुत से लोग व्हाट्सएप / इंटरनेट पर हर चीज को गंभीरता से लेना शुरू कर देते हैं, जिससे तनाव और चिंता बढ़ जाती है। ऐसी चीजों पर आंख मूंदकर नहीं विश्वास करना चाहिए। जीवन को हमेशा एक भरे हुए गिलास के रूप में देखना चाहिए न कि आधआ भरा या आधा खाली रूप में।
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मनोचिकित्सक विशेषज्ञों के मुताबिक जितना हो सके एक सामान्य दिनचर्या के साथ चलें। घरों में रहने के कारण लोग अपने नियमित समय पर स्नान नहीं करते हैं, वे शाम या रात को स्नान करते हैं। लेकिन छोटी-छोटी चीजें बहुत ज्यादा मायने रखती हैं। बोहतर होगा कि 21 दिन के लॉकडाउन में भी अपने समय पर जागें, नियमित रूप से स्नान करें। पूरे दिन पजामा में न रहकर काम के मुताबिक कपड़े जरूर पहनें। इन बुनियादी बातों से आपको एक दिनचर्या, एक उद्देश्य की अनुभूति होती है।
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