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कोरोना का सबसे खतरनाक प्रभाव: नींद नहीं आती और भूल रहे हैं छोटी-छोटी बातें तो हो जाएं अलर्ट

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : social media
विश्व को कोरोना वायरस से जूझते हुए एक वर्ष से अधिक हो चुका है लेकिन अभी तक भी कोई वैक्सीन तैयार नहीं हो पाई है। आए दिन विश्व में कहीं न कहीं इस महामारी का कोई नया दुष्प्रभाव जरूर सामने आ रहा है। ब्रिटिश जर्नल लैंसेट साइकेट्री में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, कोरोना वायरस न सिर्फ मनुष्य को शारीरिक रूप से कमजोर कर रहा है बल्कि मानसिक तौर पर भी इस महामारी के कई सारे नकारात्मक प्रभाव हैं। एक अन्य शोध में यह पाया गया है कि कोरोना से ठीक होकर आ जाने के बाद कुछ मरीजों की तंत्रिकाओं पर प्रभाव पड़ा है। मानसिक सेहत में जब लंबे समय तक सुधार नहीं हो पाता है तो वह मस्तिष्क को प्रभावित करती है। आइए जानते हैं, किस प्रकार हैं यह दोनों शोध और क्या हैं इनके परिणाम।





 
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research
क्या है यह शोध?
यू.के में हुए इस शोध के अनुसार, जब अप्रेल 2020 के युवाओं की मनोस्थिति की 2018 के युवाओं से तुलना की गई तो 2020 के युवाओं में मानसिक समस्याओं की अति पाई गई। इसी शोध के दूसरे आंकलन में यह पाया गया कि यू.के में न सिर्फ कोरोना से जूझने वाले लोगों को मनोवैज्ञानिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है बल्कि बुजुर्ग, अकेले रहने वाले लोग, बच्चों के साथ रहने वाले लोग, गरीब, पहले से किसी रोग से ग्रसित लोग भी इस महामारी के दौर में चिंता, अवसाद और कोरोना के डर का शिकार हुए हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
शोध की प्रक्रिया
यू.के में हुए शोध में कोरोना पीड़ित और स्वस्थ व्यक्ति दोनों को ही शामिल किया गया है। 12 प्रश्नों की एक प्रश्नावली सर्वे में शामिल सभी लोगों से ऑनलाइन भरवाई गई है। शोधकर्ताओं ने उत्तरों का आंकलन कर मरीज व सामान्य व्यक्ति की मानसिक सेहत का सामान्य और तुलनात्मक अध्ययन किया। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
परिणाम
उत्तरों का आंकलन करने के बाद यह पाया गया कि कोरोना से पीड़ित मरीज जब स्वस्थ होकर लौटता है तो बहुत दिनों तक वह ठीक से सो नहीं पाता है। उससे जुड़े अन्य लोग भी इस तरह की समस्या का सामना करते हैं। इलाज में खर्च हुए रूपए उसे आर्थिक रूप से कमजोर करते हैं जिसका प्रभाव भी पूरे परिवार की मनोस्थिति पर पड़ता है। जो लोग कोरोना से पीड़ित नहीं हैं लेकिन घर से दूर रहकर काम कर रहे हैं, उन्हें घर के बड़े -बुजुर्गों की चिंता सताती है व जो लोग फ्रंटलाइन वर्कर्स हैं, वे अवसाद का शिकार हो जाते हैं।
 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : social media
एक अन्य शोध
लैंसेट साइकेट्री में ही प्रकाशित एक अन्य शोध के अनुसार, महामारी के इस दौर में जिन कोरोना पीड़ितों में मानसिक परेशानियों का स्तर चरम पर आया है, उनकी तंत्रिकाओं पर भी प्रभाव पड़ा है। शोध में शामिल लोगों पर एक तय समय के लिए निगरानी रखी गई, उनके व्यवहार और लक्षणों के आधार पर परिणाम जारी किया गया है।

 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : getty images
परिणाम
125 मरीजों पर किये गए इस शोध में 125 कोरोना मरीजों में तरह-तरह की न्यूरोसाईक्रियाट्रिक परेशानी पाई गई हैं। शोध के अनुसार, 57 मरीजों को ब्रेन स्ट्रोक, 39 मरीजों को इंसेफेलाइटिस यानी भ्रम और गतिशीलता में परेशानी, 10 मरीजों को साइकोसिस यानी एक तरह का पागलपन, 7 मरीजों को मस्तिष्क में सूजन, 6 मरीजों में डिमेंशिया यानी दिमाग पर नियंत्रण न रहने की समस्या देखी गई। यह सब परेशानियां तंत्रिकाओं के कमजोर होने से ही उत्पन्न हुई हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
इबोला के बाद कोरोना का तंत्रिकाओं पर पड़ रहा है प्रभाव
इबोला वायरस के दौरान सियरा लिओन में हुए सर्वे में भी मरीजों व उनके दोस्त, रिश्तेदारों में इसी तरह के लक्षण पाए गए थे । इस वजह से कई सारी मौतें भी हुई थीं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
मानसिक दबाव बन रहा समस्या
शोध में यह स्पष्ट है कि अवसाद और उत्कंठा का सीधा प्रभाव लोगों की तंत्रिकाओं पर पड़ रहा है। कोविड-19 से ग्रसित लोग लंबे समय तक अकेले रहने के कारण व बच्चे स्कूल न जा पाने के कारण दिमाग को अलग- अलग विषयों पर केंद्रित करने में असमर्थ हो रहे हैं। प्रतिदिन वेतन पाने वाले लोग नौकरी के छूट जाने या कम वेतन मिलने के डर को इतना पाल चुके हैं कि वो अब उनके दिमाग पर हावी हो रहा है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixa
लक्षणों को न करें नजरअंदाज
जयपुर स्थित महावीर कैंसर अस्पताल के न्यूरोसर्जन डॉ. नितिन द्विवेदी के अनुसार, यदि कोरोना पीड़ित मरीज लंबे समय से अपनी मानसिक सेहत में सुधार नहीं देख पा रहे हैं तो उन्हें तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए क्योंकि इससे दिमागी समस्याएं बिल्कुल उत्पन्न हो सकती हैं जिसके शुरूआती लक्षण याद्दाश्त कमजोर होना, नींद न आना या बहुत अधिक आना, सिर में बहुत अधिक दर्द होना या भारीपने बने रहना आदि हैं। यदि इन्हें नजरअंदाज किया गया तो आगे यह समस्याएं बड़ी बीमारियों में तब्दील हो सकती हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
116 देशों में इस वर्ष बढ़े हैं मानसिक परेशानियों से पीड़ित मरीज
वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे के अवसर पर वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार,  89 प्रतिशत देशों में इस महामारी के दौरान मानसिक परेशानियों से जूझ रहे मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी पाई गई है। महामारी के इस दौर में 17 प्रतिशत देशों ने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर अतिरिक्त फंडिंग भी की है।
 
नोट- यह लेख जर्नल लैंसेंट साइक्रेट्री में प्रकाशित शोध पत्रों के आधार पर तैयार किया गया है। अधिक जानकारी के लिए लैंसेंट साइकेट्री की वेबसाइट पर जाएं।
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