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Buddha Purnima 2026: बुद्ध पूर्णिमा कब है? जानें तारीख, इतिहास और महत्व

Thu, 30 Apr 2026 04:32 PM IST
Shivani Awasthi लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला

सार

Buddha Purnima 2026 Date: बुद्ध पूर्णिमा वैशाख पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है और यह गौतम बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण की याद में मनाया जाने वाला प्रमुख बौद्ध पर्व है।

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बुद्ध पूर्णिमा कब है - फोटो : AI
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विस्तार
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Buddha Purnima Kab Hai 2026: भारत की आध्यात्मिक परंपराओं में बुद्ध पूर्णिमा का विशेष महत्व है। यह दिन गौतम बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति (निर्वाण) और महापरिनिर्वाण, तीनों घटनाओं की स्मृति में मनाया जाता है। यही कारण है कि यह दिन बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र माना जाता है।

बुद्ध पूर्णिमा वैशाख महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है, जो आमतौर पर अप्रैल या मई में पड़ती है। इस दिन लोग मंदिरों में जाकर प्रार्थना करते हैं, दान-पुण्य करते हैं और भगवान बुद्ध की शिक्षाओं अहिंसा, करुणा और शांति को अपनाने का संकल्प लेते हैं।

आज के समय में जब जीवन में तनाव और अस्थिरता बढ़ रही है, तब बुद्ध के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। उनका संदेश हमें सादगी, संयम और संतुलन का मार्ग दिखाता है। इस लेख में बुद्ध पूर्णिमा 2026 की तारीख, इसका इतिहास, महत्व और इसे कैसे मनाया जाता है, इन सब के बारे में जानेंगे।

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बुद्ध पूर्णिमा 2026 कब है?

साल 2026 में बुद्ध पूर्णिमा 1 मई 2026, शुक्रवार को मनाई जा रही है। यह दिन वैशाख पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है।


बुद्ध पूर्णिमा का इतिहास

गौतम बुद्ध का जन्म लगभग 563 ईसा पूर्व लुंबिनी में हुआ था। उन्होंने कठोर तपस्या के बाद बोधगया में ज्ञान प्राप्त किया। उनके उपदेशों ने दुनिया को शांति और करुणा का संदेश दिया। आज का दिन गौतम बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण की याद में मनाया जाता है।

 

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बुद्ध पूर्णिमा का महत्व

यह दिन हमें जीवन में मध्यम मार्ग अपनाने की प्रेरणा देता है। बुद्ध के अनुसार, लालच, क्रोध और मोह से दूर रहकर ही सच्ची शांति प्राप्त की जा सकती है। इस दिन लोग दान, ध्यान और सेवा के कार्य करते हैं।

गौतम बुद्ध कौन थे?

गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक और एक आध्यात्मिक गुरु थे। इनका जन्म पूर्व नेपाल के लुंबिनी में हुआ था। प्रारंभिक समय में उनका नाम सिद्धार्थ गौतम था। लेकिन जब उन्होंने सांसरिक दुखों को देखा तो इस पीड़ा से मुक्ति और ज्ञान की तलाश में 29 साल के सिद्धार्थ ने राजपाठ त्याग दिया। बोधगया में उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई, जिसके बार वह बुद्ध कहलाएं। यहां से बौद्ध धर्म की शुरुआत हुई। 80 वर्ष की आयु में उन्होंने कुशीनगर में अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया।


कैसे मनाई जाती है बुद्ध पूर्णिमा?

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