सावन यानी रिमझिम बूंदों का महीना! बादल, ठंडी हवाओं की लहरें, कोयल की कुहू-कुहू- सावन के ये नजारे मन में बस जाते हैं। तेज गर्मी और आंधी की उमस के बाद सावन की हल्की फुहारों से मिली ठंडक जिंदगी में एक नई ऊर्जा भर देती है। लेकिन इस दृश्य को आप शहरों में कैसे महसूस करेंगी? यहां तो हम खुद ही प्रकृति से दूर हो गए हैं।
सावन को कितना जिया
जीवन की भागदौड़ में सावन कब आया, पता ही नहीं चलता। कुछ लोग कहते हैं कि सावन में अब वो बात नहीं! सच है, सावन में वो बात कहां, क्योंकि हम बदल गए हैं। मौसम तो आज भी वही है। याद है, सावन के महीने में जब काले-काले बादल उमड़-घुमड़ कर बरसते थे, तब गांवों में महिलाएं झूले डालकर कजरी गीत गाया करती थीं। पूरे महीने घर में उत्सव का माहौल रहता था। जिस तरह सावन में प्रकृति श्रृंगार रचती है, उसी तरह सावन में महिलाएं सोलह श्रृंगार से खुद को सजा लेती थीं। एक समय था, जब मौसम पर आधारित गीतों से सभी ऋतुओं के बारे में जानकारी मिलती थी, मगर आज पुरानी परंपरा और उससे जुड़े गीत आधुनिक जमाने की चकाचौंध में खो गए हैं।
झूले के ढेर सारे फायदे
चारों ओर हरियाली, ठंडी हवाओं के झोंके, कोयल की मीठी बोली, बारिश की फुहार और सखियों का साथ। फिर कैसे दिल मान सकता है सावन में बिना झूला झूले। यही तो मौसम है अपनी सखियों संग सावन के मधुर गीत गाकर आम के पेड़ पर पड़े झूले पर मस्ती करने का। हरियाली तीज हो या कजरी, त्योहार के बहाने सावन के महीने में झूला झूलने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। साल में एक बार होने वाले इस रोमांचक पल का इंतजार हर सुहागन को होता है। सावन में बगीचे में लगे झूले के प्रति मन में विशेष उल्लास होता था। हालांकि झूला झूलना मात्र आनंद नहीं, बल्कि इसके पीछे स्वास्थ्य लाभ भी हैं।
- सावन मास में हवाएं अन्य महीनों की तुलना में अधिक शुद्ध होती हैं। ऐसे में बाहर की एक्टिविटीज श्वसन तंत्र के लिए सही होती हैं।
- झूलते समय आंखें कभी खुलती हैं तो कभी बंद होती हैं। इस क्रम से आंखों का व्यायाम हो जाता है।
- इसी तरह झूला झूलने से हमारे मन में हर्ष और उल्लास की वृद्धि होती है।
- झूलते समय सांस अधिक भरी, रोकी और गति से छोड़ी जाती है, जो एक तरह का प्राणायाम है। इससे फेफड़े सुदृढ़ होते हैं।
- कुल मिलाकर, झूला उल्लास के साथ-साथ सेहत के लिए भी फायदेमंद होता है।