बैसाखी के दिन अंतिम गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। बैसाखी कृषि पर्व के तौर पर भी मनाया जाता है, क्योंकि इस दौरान पंजाब में रबी की फसल पककर तैयार हो जाती है। बैसाखी के दिन लोग ढोल-नगाड़ों पर नाचते-गाते हैं। गुरुद्वारों को सजाया जाता है, भजन-कीर्तन कराए जाते हैं। लोग एक-दूसरे को नए साल की बधाई देते हैं। घरों में कई तरह के पकवान बनते हैं और पूरा परिवार साथ बैठकर खाना खाता है।
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सुबह से शाम तक वाहेगुरु की कृपा,
ऐसे ही गुजरे हर एक दिन
न कभी हो किसी से गिला-शिकवा,
एक पल न गुजरे खुशियों बिन
बैसाखी दीयां वधाईयां।
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ओह खेतां दी महक, ओह झूमरां दा नचना, बड़ा याद आउंदा है।
तेरे नाल मनाया होया हर साल याद औंदा है।
दिल करदा है तेरे कोल आके वैसाखी दा आनंद लै लां, की करां काम्म दी मजबूरी
फिर वी दोस्त तूं मेरे दिल विच रेहंदा है।
हैप्पी बैसाखी
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नचले गाले हमारे साथ,
आई है बैसाखी खुशियों के साथ
मस्ती में झूम और खीर पूरी खा,
और न कर तू दुनिया की परवाह
बैसाखी की शुभकामनाएं।