मेरे ना होने पर तुम्हें भी
मेरी कमी तो खलेगी कहीं ना कहीं.......
तुम कितना भी जताओ की
तुम्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता
फ़िर भी एक तपिश तो रहेगी कहीं ना कहीं......
मेरे ख़याल से ही आँखें भीग जायेंगीं तेरी
तब अकेले में ख़ुद से कहोगे
उसको मेरी कद्र मुझसे ज़्यादा थी कहीं ना कहीं..
मेरा क्या है, मेरे लिए तो ग़म ही स्थाई है
तुम्हें हर-पल हँसता देख सकूँ
बस यही एक फ़िक्र थी कहीं ना कहीं.......
थे जो एक-दूसरे की राहत का ज़रिया
अब जब बिछड़े हैं, तो ख़ुद में ही दफ़न हो गए हैं
कहीं ना कहीं....
हो सकता है तुम भूल भी जाओ वो किस्से वो मुलाकातें
मगर मेरी रूह में तेरी हर बात ज़िंदा रहेगीं
कहीं ना कहीं.......
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