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अमर उजाला काव्य विशेष: शख़्सियत में मिलिए इस बार उस्ताद राशिद ख़ान से

Wed, 24 Apr 2019 08:13 PM IST
विजय जैन अमर उजाला, ब्यूरो
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प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद राशिद खान - फोटो : अमर उजाला
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जिनकी आवाज़ से फूल खिलते हैं, सुबह होती है और शाम अपना रंग बदलती है, जो अपनी आवाज़ को अपने पीर, अपने बुज़ुर्गों की इबादत का सिला मानते हैं, रामपुर सहसवान घराने के रोशन फ़नकार-उस्ताद राशिद ख़ान।
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उत्तर प्रदेश के बदायूं में जन्मे राशिद ख़ान अपने जन्मस्थान पर बहुत नहीं रहे, महज़ दस साल की उम्र में पहले मुंबई और फिर मुंबई से कोलकाता आ गए। यहां अपने बुजुर्गों के साए में और आइटीसी संगीत नाटक अकाजमी से शास्त्रीय संगीत की बाक़ायदा तालीम ली और दुनिया के बड़े-बड़े फ़नकारों के सामने, महज़ ग्यारह साल की उम्र में पहली प्रस्तुति दी। 

रियाज़ और मेहनत का यह सुरीला सिलसिला आगे बढ़ता रहा। सिला यह मिला कि एक दिन जब पंडित भीमसेन जोशी ने उन्हें सुना तो कहा कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को उसका भविष्य मिल गया। उत्साद राशिद कहते हैं कि गायकी का मुझे शुरू से ही शौक था और लगन भी। बाकी आज जो कुछ भी हूं अपने उस्तादों की वजह से हूं। उनके और अपनी लगन के कारण आज इस मुकाम को हासिल किया है। सभी घरानों से बहुत कुछ सीखने को मिला।
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मात्र 11 वर्ष की उम्र में अपना पहला लाइव कंसर्ट

प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद राशिद खान - फोटो : अमर उजाला
मात्र 11 वर्ष की उम्र में अपना पहला लाइव कंसर्ट पेश करने वाले राशिद शान ने मुड़कर पीछे नही देखा और वे आज देश ही नही विदेशों में भी अपना अलग मुकाम बना चुके हैं। राशिद खान के कहा कि हर घराने की एक अलग खूबी है।  मुझे सभी को जानना था। इसलिए मैने सभी से कुछ न कुछ सीखा है और उनका आज भी आदर करता हूं। 

हमने बहुत मार खाई तभी आज इस मुकाम पर पहुंचे हैं

उस्ताद राशिद खान कहते हैं कि क्लासिकल म्यूजिक की बात करें तो इसकी जडे़ं इतनी मजबूत हैं कि इसे कोई चाह कर भी हिला नहीं सकता लेकिन वेस्टर्न म्यूजिक की वजह से आजकल के बच्चों में इसका रुझान कम होता जा रहा है। इसके लिए जरूरी है कि माता पिता अपने बच्चों को क्लासिकल म्यूजिक के बारे में जानकारी दें। बच्चों की मर्जी को जानने के बाद ही मां बाप को उन्हें उस फील्ड में डालना चाहिए उनके साथ जोर जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। 

हमने बहुत मार खाई तभी आज इस मुकाम पर पहुंचे हैं, लेकिन अब के बच्चों को न डांट पड़ रही है और न ही मार पड़ रही है। मुझे आज भी वह दिन याद है जब भुवनेश्वर एक कार्यक्रम से पहले कुछ समय के लिए सुस्ती के मूड में था। एक दम मेरे गुरु निसान हुसैन साहिब आए और उन्होंने एक जोरदार लात मारी। इसके बाद मेरे में इतनी चुस्ती आ गई कि मैने उस कार्यक्रम में सबसे बेहतरीन प्रस्तुति दे डाली। 

उस्ताद राशिद खान की आवाज़ और मुख़्तलिफ़ अंदाज़ की तपस्या से ही उन्हें पद्मश्री सहित अनगिनत सम्मानों से नवाजा जा चुका है। ये हमारे लिए फ़ख़्र की बात है कि अमर उजाला काव्य शख़्सियत में उस्ताद राशिद ख़ान हमारे ख़ास मेहमान हैं।

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