प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर ने 'तरकश' में अपने जीवन के अहम पहलुओं को शामिल किया है। बचपन, जवानी, संघर्ष, गीतों की पैदाइश और शेरो शायरी का अपना तर्जुबा जावेद अख्तर ने इस किताब में बड़ी शिद्दत से संजोया है। वह किताब की शुरुआत में ही लिखते हैं कि लोग जब अपने बारे में लिखते हैं तो सबसे पहले यह बताते हैं कि वो किस शहर के रहने वाले हैं पर मैं किस शहर को अपना शहर कहूं ? पैदा होने का जुर्म ग्वालियर में किया लेकिन होश संभाला लखनऊ में, पहली बार होश खोया अलीगढ में, फिर भोपाल में रहकर कुछ होशियार हुआ लेकिन बम्बई आकर काफी दिनों तक होश ठिकाने रहे, तो आईए ऐसा करते हैं कि मैं अपनी जिन्दगी का छोटा सा फ्लैश बैक बना लेता हूं। इसी फ्लैश बैक से एक प्रसंग हम अपने मुड़ मुड़ के देखता हूं सेक्शन में प्रकाशित कर रहे हैं।
'बाप बम्बई में है, मां कब्र में'
जावेद अख्तर लिखते हैं शहर लखनऊ, किरदार मेरे नाना, नानी दूसरे घरवाले और मैं मेरी उम्र आठ बरस है। बाप बम्बई में है, मां कब्र में। दिन भर घर के आंगन में अपने छोटे भाई के साथ क्रिकेट खेलता हूं। शाम को ट्यूशन पढाने के लिए एक डरावने से मास्टर साहब आते हैं। उन्हें 15 रुपये महीने दिए जाते हैं यह बात बहुत अच्छी तरह याद है इसलिए कि रोज बताई जाती थी। सुबह खर्च करने के लिए एक अधान्ना और शाम को एक इकन्नी दी जाती है, इसलिए पैसे की कोई समस्या नहीं है। सुबह रामजी लाल बनिए की दुकान से रंगीन गोलियां खरीदता हूं और शाम को सामने फुटपाथ पर खोमचा लगाने वाले भगवती की चाट पर इकन्नी लुटाता हूं। ऐश ही ऐश है। स्कूल खुल गए हैं।
लखनऊ के कॉल्विन कॉलेज में छटी क्लास में दाखिला होता है
मेरा दाखिला लखनऊ के मशहूर स्कूल कॉल्विन ताल्लुकेदार कॉलेज में छटी क्लास में करा दिया जाता है। पहले यहां सिर्फ ताल्लुकेदारों के बेटे पढ़ सकते थे, अब मेरे जैसे कमजातों को भी दाखिला मिल जाता है। अब भी बहुत महंगा है। मेरी फीस सत्रह रुपये महीना है। मेरी क्लास में कई बच्चे घड़ी बांधते हैं। वो सब बहुत अमीर घरों के हैं। उनके पास कितने अच्छे-अच्छे स्वेटर हैं। एक के पास तो फाउन्टेन पेन भी है। यह बच्चे इन्टरवल में स्कूल की कैन्टीन से आठ आने की चॉकलेट खरीदते हैं अब भगवती की चाट अच्छी नहीं लगती। कल क्लास में राकेश कह रहा था कि उसके डैडी ने कहा है कि वो उसे पढ़ने के लिए इंग्लैड भेजेंगे। कल मेरे नाना कह रहे थे, अरे कम्बख्त। मैट्रिक पास कर ले तो किसी डाकखाने में मोहर लगाने की नौकरी तो मिल जाएगी। इस उम्र में जब बच्चे इंजन ड्राईवर बनने का ख्वाब देखते हैं, मैंने फैसला कर लिया कि मैं बड़ा होकर अमीर आदमी बनूंगा।
उड़न खटोला और राजकपूर श्री चार सौ बीस देख चुका हूं
एक अन्य प्रसंग में गीतकार जावेद अख्तर ने अपनी फिल्मों की दीवानगी पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है। वह लिखते हैं कि दिलीप कुमार की उड़न खटोला, राजकपूर की श्री चार सौ बीस देख चुका हूं। बहुत से फिल्मी गाने याद हैं, लेकिन घर में ये फिल्मी गाने गाना तो क्या, सुनना भी मना है इसलिए स्कूल से वापस आते हुए रास्ते में जोर जोर से गाता हूं। मेरा स्कूल यूनिवर्सिटी एरिया में ही है। मेरी दोस्ती स्कूल के दो चार लड़कों के अलावा ज्यादातर यूनिवर्सिटी के लड़कों से है। मुझे बड़े लड़कों की तरह होटलों में बैठना अच्छा लगता है। अक्सर स्कूल से भाग जाता हूं। स्कूल से शिकायतें आती हैं । कई बार घर वालों से काफी पिटा भी, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा, कोर्स की किताबों में दिल नहीं लगा तो नहीं लगा।