गुरु दत्त का वास्तविक नाम वसन्त कुमार शिवशंकर पादुकोणे था। उनका जन्म 9 जुलाई, 1925 को मैंगलौर में हुआ था। निधन 10 अक्टूबर, 1964 को मुंबई में हुआ था। हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता, निर्देशक एवं फ़िल्म निर्माता थे। उन्होंने 1950 वें और 1960 वें दशक में कई बेहतरीन फिल्में दी थीं।
हिंदी फिल्मों में अगर दिल की त्रासदी किसी अभिनेता के इर्द-गिर्द घूमती है तो वह निसंदेह गुरू दत्त हैं। उनकी लगभग सभी फिल्में हिंदी सिनेमा में खोने का या गंवाने का एक शास्त्रीय बोध है। 'प्यासा' हो या 'कागज के फूल' या फिर 'भरोसा' हो या 'चौदहवीं का चांद' हो, ऐसी सभी फिल्मों की कहानी के साथ उसके गीत-संगीत भी हमेशा पसंद किए जाते रहेंगे। इस स्लाइड में हम आपको महान फिल्मकार और कलाकार गुरु दत्त के उन 5 क्लासिक गानों के बारे में बताएंगे जो हमेशा के लिए सदाबहार हैं।
फ़िल्म 'प्यासा' में गुरुदत्त और वहीदा रहमान ने दिलकश अभिनय किया था। 1957 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म को टाइम पत्रिका ने दुनिया की 100 सर्वकालिक बेहतरीन फ़िल्मों में जगह दी थी। 2003 में अंग्रेज़ी पत्रिका 'आउटलुक' ने भारत की दस सबसे प्रभावशाली फ़िल्मों के बारे में सर्वेक्षण करवाया तो चोटी की दस फ़िल्मों में से तीन गुरु दत्त की फ़िल्में थीं।
ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया...
यह गीत साहिर लुधियानवी ने लिखा है। मोहम्मद रफी की दिलकश आवाज ने इस गीत को हमेशा के लिए जीवंत कर दिया है। सचिन देव बर्मन के संगीत में यह गीत प्यासा फिल्म को पूरा करता है। इस गीत के बगैर प्यासा फिल्म अधूरी है।
ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया
ये इनसां के दुश्मन समाजों की दुनिया-2
ये दौलत के भूखे रिवाज़ों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है-2
हर एक जिस्म घायल, हर एक रुह प्यासी
निगाहो में उलझन, दिलों मे उदासी
ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी
ये दुनिया...
जहां एक खिलौना है इनसां की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती
जहां और जीवन से है मौत सस्ती
ये दुनिया...
जवानी भटकती है बेज़ार बनकर
जवां जिस्म सजते है बाज़ार बनकर
जहां प्यार होता है व्यापार बनकर
ये दुनिया...
ये दुनिया जहां आदमी कुछ नहीं है
वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है-2
जहां प्यार कि कद्र ही कुछ नहीं है
ये दुनिया...
जला दो, जला दो इसे फूंक डालो ये दुनिया
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है तुम ही सम्भालो ये दुनिया, ये दुनिया...