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जयंती विशेष: गुरु दत्त के वो 5 क्लासिक गाने, जो हमेशा गुनगुनाए जाएंगे...  

Mon, 09 Jul 2018 01:26 PM IST
काव्य डेस्क, नई दिल्ली
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गुरु दत्त - फोटो : ुरू
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गुरु दत्त का वास्तविक नाम वसन्त कुमार शिवशंकर पादुकोणे था। उनका जन्म 9 जुलाई, 1925 को मैंगलौर में हुआ था। निधन 10 अक्टूबर, 1964 को मुंबई में हुआ था। हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता, निर्देशक एवं फ़िल्म निर्माता थे। उन्होंने 1950 वें और 1960 वें दशक में कई बेहतरीन फिल्में दी थीं।
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हिंदी फिल्मों में अगर दिल की त्रासदी किसी अभिनेता के इर्द-गिर्द घूमती है तो वह निसंदेह गुरू दत्त हैं। उनकी लगभग सभी फिल्में हिंदी सिनेमा में खोने का या गंवाने का एक शास्त्रीय बोध है। 'प्यासा' हो या 'कागज के फूल' या फिर 'भरोसा' हो या 'चौदहवीं का चांद' हो, ऐसी सभी फिल्मों की कहानी के साथ उसके गीत-संगीत भी हमेशा पसंद किए जाते रहेंगे। इस स्लाइड में हम आपको महान फिल्मकार और कलाकार गुरु दत्त के उन 5 क्लासिक गानों के बारे में बताएंगे जो हमेशा के लिए सदाबहार हैं। 

फ़िल्म 'प्यासा' में गुरुदत्त और वहीदा रहमान ने दिलकश अभिनय किया था। 1957 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म को टाइम पत्रिका ने दुनिया की 100 सर्वकालिक बेहतरीन फ़िल्मों में जगह दी थी। 2003 में अंग्रेज़ी पत्रिका 'आउटलुक' ने भारत की दस सबसे प्रभावशाली फ़िल्मों के बारे में सर्वेक्षण करवाया तो चोटी की दस फ़िल्मों में से तीन गुरु दत्त की फ़िल्में थीं। 
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ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया...
यह गीत साहिर लुधियानवी ने लिखा है। मोहम्मद रफी की दिलकश आवाज ने इस गीत को हमेशा के लिए जीवंत कर दिया है। सचिन देव बर्मन के संगीत में यह गीत प्यासा फिल्म को पूरा करता है। इस गीत के बगैर प्यासा फिल्म अधूरी है। 

ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया
ये इनसां के दुश्मन समाजों की दुनिया-2
ये दौलत के भूखे रिवाज़ों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है-2

हर एक जिस्म घायल, हर एक रुह प्यासी
निगाहो में उलझन, दिलों मे उदासी
ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी
ये दुनिया...

जहां एक खिलौना है इनसां की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती
जहां और जीवन से है मौत सस्ती
ये दुनिया...

जवानी भटकती है बेज़ार बनकर
जवां जिस्म सजते है बाज़ार बनकर
जहां प्यार होता है व्यापार बनकर
ये दुनिया...

ये दुनिया जहां आदमी कुछ नहीं है
वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है-2
जहां प्यार कि कद्र ही कुछ नहीं है
ये दुनिया...

जला दो, जला दो इसे फूंक डालो ये दुनिया
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है तुम ही सम्भालो ये दुनिया, ये दुनिया...

 

वक़्त ने किया क्या हसीं सितम...

प्यासा के बाद गुरु दत्त की दूसरी क्लासिक फिल्म थी कागज के फूल, जिसमें गुरु दत्त का सशक्त अभिनय देखने को मिला। वक्त ने किया क्या हंसी सितम...गीत में सचिन देव बर्मन ने संगीत दिया है। कैफी आजमी साहब का लिखा यह गीत गीता दत्त की आवाज में सुहावना हो गया है। गीत की मासूमियत यह है कि इसे सुनकर हर किसी को ऐसा लगता है कि जैसे यह उसके जीवन से जुड़ा है।  

वक़्त ने किया क्या हसीं सितम
तुम रहे न तुम हम रहे न हम
वक़्त ने किया...

बेक़रार दिल इस तरह मिले
जिस तरह कभी हम जुदा न थे
तुम भी खो गए, हम भी खो गए
एक राह पर चलके दो क़दम
वक़्त ने किया...

जाएंगे कहां पूछता नहीं
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है कुछ पता नहीं
बुन रहे हैं दिल ख़्वाब दम-ब-दम
वक़्त ने किया...

जाने वो कैसे लोग थे जिनके...

1957 में प्रदर्शित फिल्म प्यासा का यह गीत जाने वो कैसे लोग थे...इश्क की इंतहा को जाहिर करता है। सचिन देव बर्मन ने इसमें अपना कर्णप्रिय संगीत दिया है। साहिर लुधियानवी ने इस गीत को लिखा है। हेमंत कुमार ने इसमें अपनी आवाज देकर गीत को हमेशा के लिए एक सुखद एहसास का रूप प्रदान कर दिया है।  

जाने वो कैसे लोग थे जिनके
प्यार को प्यार मिला
हमने तो जब कलियां मांगी
कांटों का हार मिला
जाने वो ...

खुशियों की मंज़िल ढूंढ़ीं तो
ग़म की गर्द मिली
चाहत के नग़मे चाहे तो
आहें सर्द मिली
दिल के बोझ को धुंधला कर गया जो ग़मखार मिला 
हमने तो जब...

बिछड़ गया...बिछड़ गया हर साथी देकर 
पल दो पल का साथ
किसको फ़ुरसत है जो थामे दीवानों का हाथ
हमको अपना साया तक अक़सर बेज़ार मिला
हमने तो जब...

इसको ही जीना कहते हैं तो 
यूं ही जी लेंगे
उफ़ न करेंगे लब सी लेंगे
आंसू पी लेंगे
ग़म से अब घबराना कैसा, ग़म सौ बार मिला
हमने तो जब...

इस भरी दुनिया में, कोई भी हमारा न हुआ...

प्यासा और कागज के फूल के बाद गुरु दत्त साहब की एक और फिल्म 'भरोसा' यादगार रही। इस फिल्म के गीत इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा नहीं हुआ...इश्क करने वालों को लंबी दिलासा देता है। रवि ने गीत को संगीत से सजाया है। राजेंद्र कृष्ण के इस गीत को हमेशा की तरह मोहम्मद रफी ने अपनी मधुर आवाज दी है।  

इस भरी दुनिया में, कोई भी हमारा न हुआ
गैर तो गैर हैं, अपनों का सहारा न हुआ

लोग रो-रो के भी इस दुनिया में जी लेते हैं
एक हम हैं कि हंसे भी तो गुज़ारा न हुआ

इक मुहब्बत के सिवा और न कुछ मांगा था
क्या करें ये भी ज़माने को गंवारा न हुआ

आसमान जितने सितारे हैं तेरी महफ़िल में
अपनी तक़दीर का ही कोई सितारा न हुआ
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चौदहवीं का चांद हो, या आफ़ताब हो...

दिल की त्रासदी के बाद इश्क में सौंदर्य को भी गुरु दत्त ने बखूबी बयां किया है। इसका सबसे सटीक उदाहरण है चौदहवीं का चांद फिल्म का गीत चौदहवीं का चांद हो या...शकील बदायूंनी के इस गीत को संगीतकार रवि ने संगीत से सजाया है। मोहम्मद रफी की आवाज में यह गीत काफी दिलकश हो जाता है। 

चौदहवीं का चांद हो, या आफ़ताब हो
जो भी हो तुम खुदा कि क़सम, लाजवाब हो

ज़ुल्फ़ें हैं जैसे कांधे पे बादल झुके हुए
आंखें हैं जैसे मय के पयाले भरे हुए
मस्ती है जिसमे प्यार की तुम, वो शराब हो
चौदहवीं का ...

चेहरा है जैसे झील मे खिलता हुआ कंवल
या ज़िंदगी के साज पे छेड़ी हुई गज़ल
जाने बहार तुम किसी शायर का ख़्वाब हो
चौदहवीं का ...

होंठों पे खेलती हैं तबस्सुम की बिजलियां
सजदे तुम्हारी राह में करती हैं कैकशां
दुनिया-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का तुम ही शबाब हो
चौदहवीं का ...
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