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धूप यूं ही नहीं शबनम को जला देती है

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धूप यूं ही नहीं शबनम को जला देती है।
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रंग फूलों के भी चेहरों का उड़ा देती है।।

खुद समंदर कभी साहिल से नहीं टकराता,
शह तो मौजों को ये कम्बख्त हवा देती है।।

रात भर रात उजालों के सितम सहती है,
आखिरी वक्त चरागों को बुझा देती है।।

सच तो ये है कि इजाफा नहीं करती कोई,
जिंदगी रोज मेरी उम्र घटा देती है।।



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