के के बिड़ला फाउंडेशन ने वर्ष 2021 का व्यास सम्मान प्रख्यात उपन्यासकार-नाटककार असगर वजाहत को उनके नाटक ‘महाबली’ को प्रदान करने की घोषणा की है। वर्ष 2019 में प्रकाशित इस उपन्यास को सुप्रसिद्ध विद्वान प्रो. राम जी तिवारी की अध्यक्षता में संचालित एक चयन समिति ने पुरस्कार के लिए चयन किया। ज्ञात हो कि सम्मान वर्ष से ठीक पहले 10 वर्ष की अवधि में प्रकाशित किसी भी भारतीय नागरिक की हिन्दी की एक उत्कृष्ट साहित्यिक कृति को व्यास सम्मान प्रदान की जाती है। वर्ष 1991 में आरंभ इस सम्मान में चार लाख रुपये की पुरस्कार राशि के साथ प्रशस्ति व प्रतीक चिन्ह भेंट किया जाता है।
असगर वजाहत का जन्म पांच जुलाई 1946 में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में हुआ था। दिल्ली स्थित जामिला मिलिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रह चुके प्रो. असगर वजाहत की दर्जनों कृतियां प्रकाशित हैं। इनमें उपन्यासः सात आसमान, कैसी आगी लगाई, रात में जागने वाले, पहर-दोपहर, मन माटी, चहारदर, फिरंगी लौट आये, जिन्ना की आवाज, वीरगति, नाटक : जित लाहौर नईं वेख्या वो जन्म्या ई नईं, अकी, समिधा नुक्कड़ नाटक : सबसे सस्ता गोश्त कहानी संग्रह : मैं हिंदू हूँ, दिल्ली पहुँचना है, स्वीमिंग पूल, सब कहाँ कुछ यात्रा संस्मरण : चलते तो अच्छा था, इस पतझड़ में आना आलोचना : हिंदी-उर्दू की प्रगतिशील कविता वगैरह शामिल हैं।
कथा क्रम सम्मान, हिंदी अकादमी, इंदु शर्मा कथा सम्मान के साथ ही शलाका सम्मान जैसे अलंकरण से विभूषित और पिछले दिनों आई विशिष्ट कहानी संग्रह ‘डेमोक्रेसिया’ के लेखक असग़र वजाहत उन विरले कहानीकारों में गिने जाते हैं जिन्होंने पूरी तरह अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखते हुए भाषा और शिल्प के सार्थक प्रयोग किए हैं। उनकी कहानियाँ आश्वस्त करती हैं कि कहानी की प्रेरणा और आधारशिला सामाजिकता ही हो सकती है।
नाटक महाबली सत्ता और कला के बीच के संबंधों पर आधारित है। इसमें मुगल सम्राट अकबर और तुलसीदास की बातचीत है। सपने में की गई यह बातचीत सत्ता और कला के संबंधों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालती है। तुलसीदास सम्राट अकबर को महाबली नाम से संबोधित करते हैं। यह नाम अब्दुल रहीम खानखाना द्वारा दिया गया है। सम्राट अकबर तुलसीदास को गोस्वामी नाम से संबोधित करते हैं और उनसे सीकरी न आने का कारण पूछते हैं। पूरा संवाद बहुत ही सरल, छोटे वाक्यों में और तीक्ष्ण व्यंग्य लिए हुए था। नाटक के अन्य पात्रों में तुलसीदास के शिष्य और टोडरमल और अब्दुल रहीम खानखाना प्रमुख हैं। जिन्हें आज की सत्ता में भी पहचाना जा सकता है।