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अमेरिकी विदेश नीति की वह ऐतिहासिक भूल: 1979 की इस्लामी क्रांति को समझने में हुई चूक, संघर्ष अब भी जारी है...

सार

कुछ ही दिन पहले लॉन्च हुई पत्रकार स्कॉट एंडरसन की यह किताब बताती है कि 1979 की इस्लामी क्रांति के खतरे को न समझ पाने की वजह से अमेरिकी विदेश नीति इस तरह पटरी से उतरी कि अब तक जूझ ही रही है।
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अमेरिकी विदेश नीति में हुई चूक की पड़ताल करती है एंडरसन की ये किताब - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी
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विस्तार
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वर्ष 1977 में ईरान की राजकीय यात्रा पर पहुंचे अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने शाह मोहम्मद रजा पहलवी को ‘बादशाहों का बादशाह’ कहते हुए बधाई दी, और ईरान की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह 'स्थिरता का एक द्वीप' है। विडंबना देखिए कि आज उसी अमेरिका का एक राष्ट्रपति ईरान को बर्बाद करना चाहता है।

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बेस्टसेलर पुस्तकों के लेखक स्कॉट एंडरसन की पुस्तक किंग ऑफ किंग्स ईरानी क्रांति का एक अद्भुत इतिहास प्रस्तुत करती है, जो आधुनिक समय की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। यह शानदार कृति अमेरिकी सरकार की भारी गलतियों को उजागर करती है और धार्मिक राष्ट्रवाद के उदय का पता लगाती है, तथा आज की वैश्विक अशांति के बारे में आवश्यक अंतर्दृष्टि प्रदान करती है।

ईरान के पास दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी सेना थी और वह अरबों डॉलर के तेल की कमाई में मस्त था। शासन के खतरनाक गुप्त पुलिस बल एसएवीएके ने कम्युनिस्ट विरोध को कुचल दिया था, और शाह ने देश के भीतर रूढ़िवादी मुस्लिम मौलवियों को खरीद लिया था। शीत युद्ध में एक सहयोगी के रूप में वह अजेय और अमेरिका के लिए अमूल्य प्रतीत होता था।
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चौदह महीने बाद, अयातुल्ला खुमैनी नामक एक उग्र धर्मगुरु के नेतृत्व में धार्मिक क्रांति के कारण शाह को सिंहासन से बेदखल कर दिया गया और वह ईरान से भाग गया। इसके बाद हुए बंधक संकट ने दुनिया में अमेरिका की प्रतिष्ठा को हमेशा के लिए धूमिल कर दिया।

ईरान का आखिरी शाह शेक्सपियर की त्रासदी का एक पात्र था : बाहर से घमंडी और वैभवशाली, अंदर से असुरक्षित और अनिर्णायक, एक फारसी रिचर्ड द्वितीय, जो अपने पतन के बाद भी आत्म-सम्मान से भरा हुआ था। जनवरी, 1979 में जब वह आखिरी बार ईरान से रवाना होने के लिए विमान की सीढ़ियों के नीचे खड़ा था, उसके गालों पर आंसू बह रहे थे और वह जानलेवा कैंसर से जूझ रहा था। यह देख कठोर से कठोर हृदय वाले व्यक्ति को भी इस तानाशाह पर दया आई होगी।

स्कॉट एंडरसन ने जो कहानी बुनी है, वह एक ऐसे तानाशाह की है, जो अपनी प्रजा के तिरस्कार को नहीं समझता और एक ऐसी महाशक्ति की है, जो विनाश की ओर अग्रसर है। एंडरसन ने दृढ़तापूर्वक तर्क दिया है कि ईरानी क्रांति, फ्रांसीसी और रूसी क्रांतियों की तरह ही दुनिया को हिला देने वाली घटना थी।

पश्चिम एशिया, भारत, दक्षिण पूर्व एशिया, यूरोप और अब अमेरिका में आर्थिक रूप से हाशिये पर पड़े धार्मिक लोगों की धर्मनिरपेक्ष कुलीन वर्ग के प्रति घृणा ने हिंसा और उथल-पुथल को जन्म दिया है–और ईरान इसका उदाहरण था। किंग ऑफ किंग्स इतिहास की एक साहसिक कृति और चेतावनी है। पश्चिम एशिया से लेकर यूक्रेन युद्ध तक, दुनिया अब भी शाह के पतन के झटकों से जूझ रही है, और यह अभी खत्म नहीं हुआ है।

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