लोकसभा चुनावों की तारीख नजदीक आने के साथ ही झारखंड में क्षेत्रीय दल, कांग्रेस और भाजपा की परेशानी बढा रहे हैं। समीकरणों और आंकडों के लिहाज से राज्य के अलग-अलग हिस्सों में कम से कम कम दस सीटों पर क्षेत्रीय दलों के पेंच से दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को मशक्कत करनी पड रही है।
कांग्रेस और भाजपा के रणनितिकार इसे बखूबी परखने में जुटे हैं कि क्षेत्रीय दलों के इन पेंचों से किस सीट पर उन दोनों में से किसका लाभ और किसका नुकसान होगा।
इस बीच नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी समेत भाजपा और कांग्रेस के बडे नेताओं का झारखंड दौरा तेज हो गया है। केंद्र में सरकार बनाने के लिए एक-एक सीट पर उनकी चिंता साफ झलक रही है।
कांग्रेस और भाजपा को इसका भी अंदेशा है कि जातीय समीकरणों और स्थानीय मुद्दों के आधार पर क्षेत्रीय दल उन्हें कहीं कम कहीं ज्यादा परेशान कर सकते हैं।
यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस को अलग-अलग संसदीय सीटों पर अलग-अलग हिसाब से झारखंड मुक्ति मोर्चा, झारखंड विकास मोर्चा, आजसू पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और तृणमूल कांग्रेस की मौजूदगी का सामना करना पड रहा है।
14 सीटें, तीन चरण
झारखंड में लोकसभा की 14 सीटें हैं। इनमें पांच- खूंटी, लोहरदग्गा, दुमका, राजमहल, चाईबासा आदिवासियों के लिए और पलामू सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हैं।
शेष आठ सीटें- रांची, हजारीबाग, जमशेदपुर, चतरा, धनबाद, कोडरमा, गिरिडीह सामान्य वर्गों के लिए हैं। सभी 14 सीटों पर तीन चरणों में क्रमशः 10, 17 और 24 अप्रैल को चुनाव होंगे।
इन चुनावों में भाजपा को अपने कब्जे की सात सीटें बचाने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस को पिछले चुनावों में मिली सिर्फ एक सीट पर जीत से आगे बढने की।
हालांकि भाजपा खेमे की उम्मीदें कायम हैं कि हर तरह के बनते-बिगडते समीकरण अंततः नरेंद्र मोदी के नाम और प्रभाव से उनके ही पक्ष में जाएंगे और भाजपा पिछले चुनावों के परिणाम से बेहतर करेगी।
भाजपा की नजर इस पर भी लगी है कि कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे का लाभ उसे मिल सकता है।
क्षेत्रीय दलों के प्रभाव और पेंच का काट निकालने के ख्याल से ही भाजपा ने संथाल परगना के राजमहल संसदीय सीट पर झामुमो के वरिष्ठ विधायक हेमलाल मुर्मू और जमशेदपुर सीट पर झामुमो के ही दूसरे विधायक विद्युतवरण महतो को अपना उम्मीदवार बना लिया है।
जमशेदपुर में कुर्मी वोटों का खासा प्रभाव है। जमशेदपुर में झाविमो के वर्तमान सांसद डॉ अजय कुमार फिलहाल सशक्त उम्मीदवार माने जा रहे हैं। लेकिन अपनी वापसी के लिए भाजपा ने वहां कु्र्मी जाति के उम्मीदवार को उतारकर बिसात बिछा दी है। इन दोनों सीटों पर झामुमो भी जोर लगा रहा है।
चुनावी मुद्दे
चुनावी मुद्दों पर गौर करें, तो भाजपा, यूपीए सरकार को बदलने पर जोर दे रही है। भाजपा का फोकस कथित घपले-घोटालों पर भी है। जबकि कांग्रेस यूपीए सरकार के कामों को गिना रही हैं।
जबकि अधिकतर क्षेत्रीय दल यह बता रहे हैं कि राष्ट्रीय पार्टियों से झारखंड का भला नहीं होने वाला।
इनके अलावा झारखंड के विकास और अस्थिर राजनीति को पटरी पर लाने की वकालत लगभग सभी दल कर रहे हैं।
कांग्रेस को फिलहाल थोडी राहत इस वजह से भी है कि झामुमो, राजद के साथ उनके गठबंधन है।
भाजपा अकेले सभी 14 सीटों पर चुनाव लड रही है।
गठबंधन के तहत चुनाव लडने के लिए कांग्रेस को नौ, झामुमो को चार और राजद को एक सीटें मिली हैं।
हालांकि 2009 के चुनावों में भी कांग्रेस का झामुमो के साथ गठबंधन था, लेकिन कांग्रेस को सिर्फ एक रांची सीट पर जीत हासिल हुई थी।
जबकि क्षेत्रीय दलों में झामुमो को दो, झारखंड विकास मोर्चा को दो और दो सीटें निर्दलीय के खाते में गई थीं। भाजपा सात सीटें जीती थी।
आजसू, झाविमो, तृणमूल की घेराबंदी से निकलने का संकट
झारखंड विकास मोर्चा के अध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के दुमका और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश कुमार महतो के रांची से चुनाव लडने की दावेदारी के बाद पूरे राज्य की नजर इन दोनों सीटों पर है।
झारखंड विकास मोर्चा ने अकेले राज्य की सभी 14 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि आजसू पार्टी भी अकेले दस सीटों पर चुनाव लड रही है।
भाजपा के वरिष्ठ विधायक सीपी सिंह कहते हैं कि कुछ सीटों पर क्षेत्रीय दलों के उम्मीदवार ठीकठाक वोट हासिल कर सकते हैं, लेकिन सीटें जीतने की स्थिति में वे नहीं हैं। अंततः लडाई भाजपा और कांग्रेस के बीच ही होगी। और झारखंड में भाजपा अच्छी जीत दर्ज करेगी। लोकसभा चुनाव के वोटर इसे समझते हैं कि क्षेत्रीय दलों की भूमिका महज मोल-तोल करने वाली होती हैं।
अब तक हुए चुनावों में रांची संसदीय सीट पर कांग्रेस- भाजपा की सीधी टक्कर होती रही है।
पिछले दो चुनावों (2004-2009) में कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय बेहद कम मतों के अंतर से ये सीट जीतते रहे हैं।
इस बार आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष सुदेश महतो के चुनाव लडने से भाजपा के सामने जातीय समीकरणों को संभालने की मुश्किलें हैं।
दरअसल सुदेश महतो कुर्मियों के अलावा महिला व युवाओं के बीच तेजी से ऊभरने लगे हैं। रांची लोकसभा सीट के सिल्ली विधानसभा क्षेत्र से वे तीन बार लगातार विधायक भी चुने गए हैं।
रांची में कांग्रेस को भी आजसू, झाविमो, तृणमूल की घेराबंदी से निकलने का संकट है।
क्षेत्रीय मुद्दे महत्वपूर्ण
पूर्व आइपीएस अधिकारी अमिताभ चौधरी झाविमो के टिकट पर और हाल ही में तृणमूल में शामिल हुए विधायक बंधु तिर्की भी रांची से ही चुनाव लड रहे हैं।
इनके अलावा जमशेदपुर, गोड्डा, धनबाद, कोडरमा, पलामू, गिरिडीह, हजारीबाग, लोहरदग्गा, चाईबासा संसदीय सीटों के लिए भी कांग्रेस-भाजपा में क्षेत्रीय दलों के पेंचों से बच निकलने की बेचैनी साफ दिखती हैं।
भाजपा और कांग्रेस के तमाम दावों और कोशिशों को आजसू पार्टी के वरिष्ठ विधायक चंद्रप्रकाश चौधरी सिरे से खारिज करते हैं। वे कहते हैं कि झारखंड में क्षेत्रीय मुद्दे और सवाल ही अहम हैं। लिहाजा इस बार भाजपा और कांग्रेस को कई सीटों पर हार का सामना करना पडेगा। चौधरी का दावा है कि रांची और हजारीबाग सीट आजसू ही जीतेगी।
उधर दुमका से सात बार चुनाव जीत चुके झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष शिबू सोरेन से इस बार भाजपा के अलावा झाविमो के केंद्रीय अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी को भिडना है।
1998 में बाबूलाल मरांडी ने दुमका सीट पर शिबू सोरेन और 1999 में शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन को हरा चुके हैं। तब बाबूलाल मरांडी भाजपा में थे।
झारखंड विकास मोर्चा के केंद्रीय महासचिव प्रवीण सिंह का मानना है कि झारखंड में नीति सिद्धांत की राजनीति सिर्फ उनकी पार्टी ही करती है। लिहाजा जनता विकल्प के तौर पर सिर्फ झाविमो की ओर देख रही है। झाविमो पिछले चुनावों से ज्यादा सीटें जीतेगा।
जबकि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत का कहना है कि क्षेत्रीय दलों का प्रभाव भले ही दिख रहा है, लेकिन चुनाव जीतना उनके लिए आसान नहीं होगा। वे वोटरों में बिखराव ही पैदा कर सकते हैं।
कोडा का असर
चाईबासा संसदीय सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा की विधायक पत्नी गीता कोडा और खूंटी संसदीय सीट पर झारखंड पार्टी के विधायक एनोस एक्का चुनाव लड रहे हैं।
2009 में मधु कोडा जेल में रहकर ही चाईबासा से सांसद का चुनाव जीते थे, जबकि जेल में रहकर एनोस एक्का कोलेबिरा से विधायक का चुनाव जीते थे।
चाईबासा के आदिवासी इलाकों में कोडा दंपत्ति के राजनीतिक प्रभाव की वजह से यह माना जा रहा भाजपा और कांग्रेस को गीता कोडा से ही मुकाबला करना पडेगा।
खूंटी में छह बार चुनाव जीते भाजपा के कडिया मुंडा को इस बार कांग्रेस के साथ झारखंड पार्टी से भी दो- दो हाथ करना है।
हाल ही में तृणमूल में शामिल हुए कांग्रेस विधायक चंद्रशेखर दूबे धनबाद संसदीय सीट से और दो अन्य विधायक बंधु तिर्की रांची और चमरा लिंडा लोहरदगा से चुनाव लड रहे हैं। जबकि पलामू से झामुमो के सांसद कामेश्वर बैठा भी तृणमूल से ही लड रहे हैं।
2004 में दूबे कांग्रेस से धनबाद लोकसभा क्षेत्र का चुनाव जीते थे। जबकि 2009 के चुनाव में लोहरदग्गा से चमरा लिंडा निर्दलीय लडे थे और भाजपा से महज 8283 वोट से हारे थे। लिहाजा इन चेहरों पर भी सबकी नजर है।
इनके अलावा जदयू, सपा, बसपा और वाम दलों ने भी राज्य में कई सीटों पर उम्मीदवार खडे किए हैं।