Shibu Soren Passes Away: झामुमो नेताओं के अनुसार जब नए राज्य का नाम तय किया जा रहा था, तब केंद्र सरकार की ओर से इसे 'वनांचल' नाम देने का प्रस्ताव था। लेकिन शिबू सोरेन इस नाम के सख्त खिलाफ थे। उनका स्पष्ट कहना था कि यह क्षेत्र सिर्फ जंगल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध है।
बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य बनने की लंबी लड़ाई के नायक और झारखंड आंदोलन के प्रतीक पुरुष शिबू सोरेन ‘गुरु जी’ का जीवन संघर्षों से भरा रहा। उनके निधन से पूरे झारखंड में शोक की लहर है। उन्हें जानने वाले लोग आज उनके जीवन, संघर्ष और झारखंड आंदोलन में उनके योगदान को याद कर भावुक हो रहे हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने कहा कि गुरु जी झारखंड के आदिवासियों के दिल में बसते थे। उन्होंने जिन मुद्दों को लेकर संघर्ष किया, वे आज भी झारखंड के विकास से सीधे जुड़े हैं। पहले इस क्षेत्र को 'वनांचल' कहा जाता था क्योंकि यहां घने जंगल, आदिवासी बहुल जनसंख्या और अपार खनिज संपदा है। लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, उद्योग जैसे बुनियादी ढांचों की भारी कमी थी। बाहरी लोग संसाधनों का दोहन कर रहे थे और स्थानीय लोग उपेक्षित थे। इसी शोषण के खिलाफ अलग राज्य की मांग ने जोर पकड़ा।
उन्होंने आगे बताया कि 20वीं सदी के मध्य से यह आंदोलन संगठित रूप लेने लगा और 1970-80 के दशक में इसे एक व्यापक जनांदोलन का स्वरूप मिला। आंदोलन के प्रमुख चेहरे शिबू सोरेन बने, जिन्हें प्यार से ‘दिशुम गुरु’ कहा गया। उन्होंने 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की स्थापना की और आदिवासी अधिकारों के लिए निर्णायक लड़ाई शुरू की।
झामुमो नेता अंतू तिर्की ने कहा कि गुरु जी ने कोयला खदानों में बंधुआ मजदूरी और महजनी प्रथा खत्म कराने के लिए व्यापक आंदोलन किया। उन्होंने श्रमिकों को उनका हक दिलाने के लिए संघर्ष किया और झारखंड की आवाज दिल्ली तक पहुंचाई। उनकी नेतृत्व क्षमता, दूरदृष्टि और संघर्ष ने झारखंड आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान दिलाई, जिसका परिणाम 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य के गठन के रूप में सामने आया।
उनके अनुसार, प्रशासनिक स्तर पर भी झारखंड को स्वतंत्रता मिली। अब राज्य अपनी योजनाएं, बजट और नीतियां स्वयं तय कर सकता है। सड़क, पुल, बिजली परियोजनाएं और शिक्षण संस्थानों की स्थापना में तेजी आई। साथ ही, आदिवासी संस्कृति, भाषाओं और परंपराओं को संरक्षित करने के लिए विशेष योजनाएं बनीं। खनन, उद्योग और सरकारी नौकरियों में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता दी गई।
नामकरण को लेकर भी हुआ था टकराव