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इन आदिवासियों को हिंदू कहलाने से परहेज, क्यों?

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झारखंड के सरना आदिवासी ख़ुद को हिंदू कहे जाने का विरोध कर रहे हैं और अपने धर्म को मान्यता दिए जाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। यह समुदाय छोटानागपुर क्षेत्र में रहता है।
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सरना आदिवासी समुदाय का कहना है कि वे हिंदू नहीं हैं। वे प्रकृति के पुजारी हैं, उनका अपना धर्म है 'सरना', जो हिंदू धर्म का हिस्सा या पंथ नहीं है।

इसका हिंदू धर्म से कोई लेना देना नहीं है। उनकी मुख्य मांग है कि उनकी गणना में उनके आगे हिंदू न लिखा जाए।

दिल्ली कूच करने की तैयारी

इस मांग के समर्थन में छोटानागपुर में रैली, जुलूस, धरना, प्रदर्शन और बैठकों का दौर चल रहा है और आगामी छह अक्टूबर को वो दिल्ली कूच करने का भी इरादा बना रहे हैं।

दिवासी सरना महासभा के संयोजक शिवा कच्छप कहते हैं, "धर्म आधारित जनगणना में जैनियों की संख्या 45 लाख और बौद्ध की जनसंख्या 84 लाख है। हमारी आबादी तो उनसे कई गुना ज़्यादा है। पूरे देश में आदिवासियों की आबादी 11 करोड़ से ज्यादा है. फिर क्यों न हमारी गिनती अलग से हो?"

पूर्व विधायक देवकुमार धान का कहना है कि धर्म आधारित जनगणना में झारखंड की कुल जनसंख्या में 42 लाख 35 हजार 786 लोगों ने अन्य के कॉलम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
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पुराना इतिहास

इस मांग को आदिवासी विषयों के जानकार और पत्रकार कोरनेलियुस मिंज भी सही मानते हैं। वो कहते हैं, "सरना धर्म वालों का दावा मज़बूत हो रहा है, इनका इतिहास काफी पुराना है। लेकिन इस पर ख़तरे बढ़ रहे हैं कि इसे दूसरे धर्म में शामिल कर संख्या बढ़ा लिए जाएं। अधिकतर जनगणना में इन्हें हन्दिू में शामिल किया जाता रहा है।"

एशिया पेसिफिक यूथ इंडिजिनेस पीपुल्स फोरम की अध्यक्ष मिनाक्षी मुंडा कहती हैं, "आदिवासियों की ये मांग पुरानी है और इसमें दम है। उनकी जनगणना अलग से होनी चाहिए, यह उनके अस्तित्व से जुड़ा सवाल है। आदिवासियों के जन्म, मृत्यु, विवाह, पर्व-त्योहार के रिति-रिवाज अलग हैं।"

हालांकि धर्म से जुड़ा यह मुद्दा सरकार में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व को लेकर अधिक है। इनका तर्क है कि अकेले झारखंड में सरकारी आंकड़े के मुताबिक़ क़रीब 80 लाख आदिवासी हैं, जबकि हक़ीक़त में यह संख्या और ज़्यादा है।

झारखंड विधानसभा की 81 सीटों में से 28 सीटें और 14 लोकसभा में चार सीटें आदिवासियों के लिए सुरक्षित हैं और आदिवासी इलाक़ों के लिए अलग से ट्राइबल एडवाइज़री काउंसिल भी है। उनकी यह मांग लंबे समय से रही है लेकिन अब यह आंदोलन की शक्ल ले रहा है।
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