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गुजारा भत्ता : एक ही बकाया पर पति को बार-बार जेल नहीं भेज सकते, लगातार तेइस बार बढ़ाई गई थी हिरासत

Sat, 17 Oct 2026 05:30 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची

सार

झारखंड हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ता के एक ही बकाये पर बार-बार जेल में रखने के आदेश को गलत ठहराते हुए दशरथ सिंह की तत्काल रिहाई का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जेल की सजा से गुजारा भत्ता चुकाने की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।

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झारखंड हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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झारखंड उच्च न्यायालय ने गुजारा भत्ता का भुगतान नहीं करने के मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गुजारा भत्ता के बकाये की वसूली के लिए किसी पति को एक ही चूक के आधार पर बार-बार जेल में बंद नहीं रखा जा सकता। उच्च न्यायालय ने दुमका के प्रधान परिवार न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता दशरथ सिंह की तत्काल रिहाई का निर्देश दिया है।

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उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की पीठ ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(3) के अंतर्गत गुजारा भत्ता न देने पर प्रत्येक अलग चूक के लिए अधिकतम एक महीने की कैद का प्रावधान है, लेकिन एक ही बकाये के लिए बार-बार जेल भेजना कानूनन गलत है।

पारिवारिक न्यायालय का आदेश और बकाया
यह मामला दुमका जिले के निवासी दशरथ सिंह और उनकी पत्नी शंपू कुमारी के बीच विवाद से संबंधित है। दोनों का विवाह 30 मई, 2017 को हुआ था और उनकी एक बेटी शक्ति कुमारी है। पत्नी ने पति पर शारीरिक तथा मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए परिवार न्यायालय में अपने और पुत्री के लिए गुजारा भत्ता की मांग की थी।
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याचिका में पत्नी ने अपने लिए 8,000 रुपये और अपनी बेटी के लिए 3,000 रुपये प्रति माह देने का अनुरोध किया था। दुमका के प्रधान परिवार न्यायालय ने मामले की सुनवाई के बाद 31 मार्च, 2023 को आदेश पारित किया था। इस आदेश के तहत अदालत ने पति को निर्देश दिया था कि वह अपनी पत्नी को 5,000 रुपये और बेटी को 3,000 रुपये हर महीने गुजारा भत्ता के रूप में दे। यह भुगतान 31 अगस्त, 2021 से लागू माना गया था।

23 अलग-अलग आदेशों के माध्यम से बढ़ाई हिरासत
पारिवारिक न्यायालय द्वारा तय राशि का भुगतान न होने पर पत्नी ने 15 मई, 2023 को बकाया रकम की वसूली के लिए अदालत में आवेदन दायर किया। इसके बाद पति को गिरफ्तार कर परिवार न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने उच्च न्यायालय में दलील दी कि परिवार न्यायालय ने बिना किसी न्यायिक विवेक के लगातार 30-30 दिनों की हिरासत के आदेश जारी किए। याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि कुल 23 अलग-अलग आदेशों के माध्यम से उसकी हिरासत अवधि को बढ़ाया गया और उसे एक भी दिन के लिए रिहा नहीं किया गया। दलील में यह तथ्य भी प्रमुखता से रखा गया कि जिन महीनों के बकाये के लिए पति पूर्व में ही जेल की सजा काट चुका था, उसी बकाये को आधार बनाकर उसे पुनः हिरासत में रखा गया।

एक ही चूक पर दोबारा सजा अनुचित
मामले की सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने माना कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(3) के तहत बकाया भुगतान न करने पर अधिकतम एक महीने की कैद दी जा सकती है। अदालत ने कहा कि प्रत्येक नई चूक पर नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन पहले से लंबित एक ही बकाये के लिए किसी व्यक्ति को दूसरी बार जेल में डालना पूर्णतः अनुचित है। उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल जेल की सजा काटने से पति की गुजारा भत्ता देने की कानूनी जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती और बकाया राशि की वसूली नियमानुसार की जा सकती है।

न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की पीठ ने 16 अप्रैल, 2026 के आदेश को निरस्त करते हुए दशरथ सिंह को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। सुनवाई के दौरान पति ने आश्वासन दिया कि जेल से बाहर आने के बाद वह बकाया राशि का कुछ हिस्सा चुकाने का प्रयास करेगा।

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