अलग राज्य के रूप में झारखंड के गठन को 26 वर्ष पूरे होने को है, लेकिन बड़े औद्योगिक निवेश को जमीन पर उतारने की चुनौती अब भी बनी हुई है। सरकारों ने अलग-अलग समय में देश-विदेश की कंपनियों के साथ करोड़ों रुपये के निवेश के लिए एमओयू किए, लेकिन जमीन की उपलब्धता, वन एवं पर्यावरणीय मंजूरी, खनिज संसाधन और बिजली खरीद समझौते जैसी समस्याओं के कारण कई परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ सकीं। इसका असर रोजगार सृजन पर भी पड़ा।
वर्ष 2003 से 2005 के बीच कई बड़े औद्योगिक घरानों ने झारखंड में स्टील और बिजली परियोजनाएं लगाने की इच्छा जताई थी। हालांकि जमीन, खनिज और कोयले की उपलब्धता, पर्यावरणीय मंजूरी तथा स्थानीय विरोध के कारण कई प्रस्ताव अटक गए। झारखंड में निवेश आकर्षित करने का सबसे बड़ा आयोजन 16-17 फरवरी 2017 को रांची में हुआ मोमेंटम झारखंड ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट था। सम्मेलन में करीब तीन लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव और 209 एमओयू की बात सामने आई थी। बाद में उद्योग विभाग ने 210 कंपनियों के साथ करीब 3.39 लाख करोड़ रुपये के समझौते बताए। इनसे दो लाख प्रत्यक्ष और तीन लाख अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने का दावा किया गया था।
करीब छह वर्ष बाद हुई समीक्षा में 210 में से 131 कंपनियां परियोजनाओं से पीछे हट चुकी थीं या उनका पता नहीं चल रहा था। इन प्रस्तावों की राशि करीब 2.68 लाख करोड़ रुपये थी। वहीं 79 कंपनियों से जुड़ी करीब 71 हजार करोड़ रुपये की परियोजनाओं को किसी स्तर पर निवेश के लिए आगे बढ़ी परियोजनाओं की श्रेणी में रखा गया। हालांकि यह पूरी तरह चालू हो चुकी परियोजनाओं का आंकड़ा नहीं है।
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विभागीय रिपोर्ट के मुताबिक 35 कंपनियां जमीन से जुड़ी समस्याओं के कारण पीछे हटीं। आदित्यपुर में इनोवा प्लास्टोमेट को 10 एकड़ और हजारीबाग में हेमकुंट आहार को पांच एकड़ जमीन की जरूरत थी, लेकिन जमीन उपलब्ध नहीं हो सकी। वहीं जेएसडब्ल्यू स्टील के 35 हजार करोड़ रुपये के प्रस्ताव समेत कुछ ऊर्जा परियोजनाएं बिजली खरीद समझौते के अभाव में आगे नहीं बढ़ीं।
वहीं हाल के दिनों में सीएम हेमंत सोरेन,उद्धोग विभाग के अधिकारी और फेडरेशन झारखंड चेम्बर ऑफ कॉमर्स की टीम के साथ दबोस ( लंदन) में व्यापार सम्मेलन में गए हुए थे। उसका भी अबतक कोई फलाफल नहीं निकाल पाया है। ऐसे में झारखंड के सामने चुनौती केवल एमओयू करने की नहीं, बल्कि जमीन, मंजूरी और आधारभूत सुविधाओं की बाधाएं दूर कर निवेश को धरातल पर उतारने की है।
इस संबंध में फेडरेशन झारखंड चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष तुलसी पटेल का मानना है कि कोई भी उद्योग स्थापित करने के लिए यहां पर जमीन की उपलब्धता ही सबसे बड़ी चुनौती है। इसके कारण ही कई बड़ी कंपनी नहीं आ पा रही है। लेकिन राज्य सरकार इस समस्या का समाधान करने के लिए तैयार हैं। FJCCI राज्य सरकार को पूरी तरह से सहयोग के लिए तैयार रहती है।