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झारखंड: रांची नगर निगम को हाईकोर्ट का बड़ा झटका, जालान रोड और अपर बाजार की दुकानों को राहत

Mon, 02 Nov 2026 03:18 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची

सार

झारखंड हाईकोर्ट ने रांची नगर निगम द्वारा जालान रोड और अपर बाजार की दुकानों के लाइसेंस रद्द करने और दुकानें खाली कराने के आदेश निरस्त कर दिए। निगम को 12 सप्ताह में सुनवाई कर नया कारणयुक्त आदेश पारित करने का निर्देश दिया।

 

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रांची नगर निगम - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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झारखंड हाईकोर्ट ने रांची नगर निगम को बड़ा झटका देते हुए जालान रोड और अपर बाजार स्थित दुकानों के लाइसेंस रद्द करने तथा दुकानें खाली कराने के आदेशों को निरस्त कर दिया है। न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने इस मामले से जुड़ी आठ रिट याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने नगर निगम को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं का पक्ष सुने, उनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज पर विचार करे और 12 सप्ताह के भीतर नया कारणयुक्त आदेश पारित करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक नगर निगम इस संबंध में अंतिम निर्णय नहीं लेता, तब तक याचिकाकर्ताओं का दुकानों पर कब्जा प्रभावित नहीं होगा।
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नगर निगम के आदेशों को दी गई थी चुनौती
याचिकाकर्ताओं ने नगर निगम की ओर से 14 अक्तूबर, 2014 को जारी लाइसेंस रद्द करने के आदेश, 4 दिसंबर, 2014 को दुकान खाली कराने के निर्देश और 13 फरवरी 2015 को पारित आदेश के खिलाफ याचिकाएं दायर की थीं। जालान रोड स्थित 5100 वर्गफीट जमीन वर्ष 1966-67 में तत्कालीन रांची नगरपालिका ने मोहन लाल कच्ची को आवंटित की थी। वहां टेंट हाउस का कारोबार संचालित होता था। मोहन लाल कच्ची के उत्तराधिकारी महेंद्र कुमार कच्ची ने वर्ष 2000 में कुछ प्रार्थियों के साथ मिलकर साझेदारी में व्यवसाय शुरू किया था।

बाद में आपसी सहमति से यह साझेदारी समाप्त हो गई, जिसके बाद जमीन प्रार्थियों के पक्ष में पुनः आवंटित करने का अनुरोध किया गया। रांची नगर निगम ने 9 दिसंबर, 2003 को यह जमीन प्रार्थियों के नाम पर आवंटित की। इसके उपरांत 5 जून, 2004 को लाइसेंस शुल्क के आधार पर समझौता हुआ। प्रार्थियों ने जमीन पर स्थायी निर्माण कराने की अनुमति मांगी, जिसे नगर निगम ने 6 अगस्त, 2004 को स्वीकृति दे दी थी।
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अदालत के समक्ष दोनों पक्षों ने रखीं दलीलें
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि दुकानों के पुनः आवंटन को लेकर बाद में विवाद उत्पन्न हुआ। नगर निगम ने 9 सितंबर, 2014 को कारण बताओ नोटिस जारी किया और जवाब मिलने पर 14 अक्तूबर, 2014 को लाइसेंस रद्द कर दुकानें खाली करने का आदेश दे दिया।

दूसरी तरफ नगर निगम की ओर से अधिवक्ता राहुल कुमार ने दलीलों का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि दुकानदारों ने लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन किया है। यह मामला दुकानों को दूसरे पक्ष को सौंपने यानी सबलेटिंग से जुड़ा है। इसके अलावा नगर निगम को उक्त जमीन पर विकास कार्य कराने की आवश्यकता है। इसलिए निगम के अधिवक्ता ने पारित आदेशों को उचित बताते हुए याचिकाओं को खारिज करने का आग्रह किया।

तीन पंक्तियों के आदेश पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की पीठ ने पाया कि नगर निगम का 14 अक्तूबर, 2014 का आदेश महज तीन पंक्तियों का था। इस आदेश में प्रार्थियों की दलीलों और दस्तावेज पर विचार नहीं किया गया था। इसी तरह 13 फरवरी, 2015 के आदेश में भी तथ्यों पर समुचित विचार नहीं हुआ था।

अदालत ने कहा कि वैधानिक प्राधिकार को सभी संबंधित तथ्यों और दस्तावेज पर विचार करने के बाद ही आदेश पारित करना चाहिए। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 14 अक्तूबर 2014, 4 दिसंबर 2014 और 13 फरवरी 2015 के आदेशों को निरस्त कर दिया। अदालत ने नगर निगम को प्रार्थियों को सुनवाई का अवसर देकर 12 सप्ताह के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित करने का निर्देश दिया
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