सार
झारखंड में 2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा ने संगठनात्मक तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी आदिवासी बहुल क्षेत्रों में संगठन मजबूत करने के साथ कुर्मी-कुड़मी मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने पर भी फोकस कर रही है। 2024 में राज्य की पांचों एसटी लोकसभा सीटें हारने के बाद आदिवासी क्षेत्रों में रणनीति को नए सिरे से तैयार किया जा रहा है।
बीजेपी में आदिवासी नेता पवन साय और गजेंद्र पटेल
- फोटो : Amar Ujala
झारखंड में 2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने अभी से संगठन और सामाजिक समीकरणों को साधने की कवायद तेज कर दी है। पार्टी का खास फोकस आदिवासी और कुर्मी-कुड़मी मतदाताओं पर है। इसी रणनीति के तहत दूसरे राज्यों के आदिवासी नेताओं को झारखंड में संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है। छत्तीसगढ़ के पवन साय और गुजरात के गजेंद्र पटेल को झारखंड में बड़ी जिम्मेदारी देना इसी अभियान का हिस्सा माना जा रहा है।
झारखंड में भाजपा के पास कई प्रमुख आदिवासी चेहरे मौजूद हैं। इसके बावजूद केंद्रीय नेतृत्व ने दूसरे राज्यों से नेताओं को जिम्मेदारी देकर संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का संदेश दिया है। पार्टी की कोशिश आदिवासी बहुल इलाकों में संगठन का विस्तार करने और इन क्षेत्रों में मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की है।
पांचों एसटी लोकसभा सीटों पर 2024 में भाजपा को मिली थी हार
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को आदिवासी आरक्षित सीटों पर अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। राज्य की सभी पांच एसटी सीटों पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। खजunti, लोहरदगा, सिंहभूम, राजमहल और दुमका सीटों पर विपक्षी गठबंधन के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। विधानसभा चुनाव में भी आदिवासी सीटों पर झामुमो-कांग्रेस गठबंधन का प्रदर्शन मजबूत रहा। 2024 के विधानसभा चुनाव में झामुमो को 34 और कांग्रेस को 16 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा ने 21 सीटों पर जीत दर्ज की। ऐसे में 2029 के लिए भाजपा इन क्षेत्रों में अपनी रणनीति को नए सिरे से तैयार कर रही है।
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कुर्मी-कुड़मी मतदाताओं पर भी पार्टी का विशेष जोर
इसके साथ ही कुर्मी-कुड़मी मतदाताओं को साधने पर भी पार्टी का विशेष जोर है। एनडीए के घटक दल आजसू पार्टी के जरिए इस सामाजिक समूह तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। पश्चिम बंगाल में आयोजित कुर्मी सम्मेलन को भी इसी व्यापक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। कुड़मी समुदाय को एसटी दर्जा देने की मांग भी राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण मुद्दा रही है, हालांकि इस पर विभिन्न पक्षों के अलग-अलग मत हैं।
परिसीमन भी 2029 के चुनाव में हो सकता है महत्वपूर्ण कारक
परिसीमन भी 2029 के चुनाव में महत्वपूर्ण कारक हो सकता है। इसके बाद सीटों की संख्या में बदलाव की संभावना है। ऐसे में भाजपा संगठन विस्तार के साथ सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों पर भी लगातार काम कर रही है। पार्टी की रणनीति में आदिवासी बहुल क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ कुर्मी-कुड़मी मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर सामाजिक समीकरणों को साधने पर जोर दिखाई दे रहा है।