बाबा बैद्यनाथ धाम में दर्शन के बाद अधिकांश शिवभक्त अपनी यात्रा यहीं समाप्त नहीं करते। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब तक दुमका स्थित बाबा बासुकीनाथ धाम में भगवान शिव का जलाभिषेक नहीं किया जाता, तब तक कांवड़ यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती। यही वजह है कि हर साल हजारों कांवरिये देवघर से बासुकीनाथ की ओर प्रस्थान करते हैं।
देवघर से बासुकीनाथ की ओर बढ़ते श्रद्धालु
सावन में बाबा बैद्यनाथ धाम में पूजा-अर्चना और दर्शन के बाद बड़ी संख्या में कांवरिये बासुकीनाथ धाम पहुंच रहे हैं। अधिकांश श्रद्धालु वाहन से यात्रा करते हैं, जबकि कई शिवभक्त पैदल और दंडवत यात्रा कर भी बाबा बासुकीनाथ के दरबार पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के बाद बासुकीनाथ में जलाभिषेक करने से ही उनकी कांवड़ यात्रा पूर्ण होती है।
समुद्र मंथन से जुड़ी है धार्मिक मान्यता
बासुकीनाथ धाम का संबंध पौराणिक समुद्र मंथन की कथा से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान वासुकी नाग को ही मंथन की रस्सी बनाया गया था। इसी कारण इस धाम का नाम बासुकीनाथ पड़ा और इसका धार्मिक महत्व अत्यंत बढ़ गया। श्रद्धालुओं के बीच यह मान्यता आज भी अटूट है।
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'फौजदारी बाबा' के नाम से भी प्रसिद्ध
बासुकीनाथ धाम के तीर्थ पुरोहित विक्की बाबा ने बताया कि भगवान शिव के इस स्वरूप को 'फौजदारी बाबा' भी कहा जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से प्रार्थना करने और अर्जी लगाने पर जीवन के विवाद, मुकदमे और अन्य बाधाओं से मुक्ति मिलती है। इसी कारण कई लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक 'सुप्रीम कोर्ट बाबा' भी कहते हैं। उन्होंने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार, दारुका नामक राक्षसनी के अत्याचार से लोगों की रक्षा के लिए भगवान शिव ने यहां प्रकट होकर भक्तों का उद्धार किया था।
बाबा का आदेश मानकर पूरी करते हैं यात्रा
श्रद्धालुओं का कहना है कि बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के बाद बासुकीनाथ जाना उनकी परंपरा और आस्था का हिस्सा है। मान्यता है कि देवघर से बासुकीनाथ तक की यात्रा करने वाले भक्तों को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि सावन के पूरे महीने दोनों धामों में शिवभक्तों का जनसैलाब उमड़ता है और 'बोल बम' तथा 'हर-हर महादेव' के जयघोष से पूरा क्षेत्र शिवमय बना रहता है।