संस्कृत...। एक ऐसी भाषा जिसका परंपरागत रूप से जुड़ाव हिंदुत्व से रहा है। लेकिन इस सोच को तोड़ते हुए झारखंड के दो स्कूलों में लगभग 100 मुस्लिम लड़कियां हैं जो संस्कृत पढ़ रही हैं।
वैकल्पिक विषय के रूप में इन सभी लड़कियों ने उर्दू या पर्शियन के बजाय संस्कृत भाषा चुनी है।
हिंदुस्तान टाइम्स में छ्पी खबर के मुताबिक इन सभी लड़कियों का कहना है कि यह अच्छी भाषा है। इसे सीखना आसान है और इसमें अच्छे अंक हासिल किए जा सकते हैं।
माता-पिता का सहयोग
इन स्कूलों में सर पर दुपट्टा रखे वेद और उपनिषद पढ़ती लड़कियों को आसानी से देखा जा सकता है।
तो क्या संस्कृत पढ़ती इन लड़कियों के माता पिता इनका विरोध कर रहे हैं? इसके जवाब है 10वीं में पढ़ रहीं शालू निशा के पास।
वो कहती है कि मेरे माता पिता ने कभी संस्कृत पढ़ने का विरोध नहीं किया बल्कि जब विषय चुनना था तो उन्हीं ने जोर दिया कि उर्दू के बजाय अपना विषय संस्कृत चुना जाए।
संस्कृत के प्रति लगाव
स्कूल के प्रिंसिपल शिव शंकर पोद्दर भी अपने स्कूल में 9वीं और 10वीं के बच्चों को संस्कृत पढ़ा चुके हैं। उनका कहना है कि मुझे इन सारे बच्चों का संस्कृत के प्रति जो प्रेम है वो बेहद प्रेरित करता है। खास तौर पर स्कूल में पढ़ने वाली मुस्लिम बच्चियों का इस भाषा के प्रति लगाव मुझे बहुत गौरवांन्वित करता है।
उनका कहना है विषय चुनना पूरी तरह से बच्चों या उनके परिवार की इच्छा पर निर्भर करता है। विषय चुनने के लिए बच्चों पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं डाला जाता।
इसके अलावा उन्हें किसी तरह के श्लोक या संस्कृत की प्रार्थनाओं के लिए कोई जोर नहीं दिया जाता। लेकिन आर्श्चजनक रूप से लड़कियों का इस भाषा के प्रति झुकाव ही इतना है कि सभी लड़कियों के अंक 80% से भी ज्यादा हैं।
नौकरी का वादा!
गोमोह आजाद हिंद हाई स्कल के प्रिंसिपल अंजन मिंज का कहना है कि हमारे स्कूल में उर्दू के लिए स्थाई शिक्षक हैं। लेकिन यदि बच्चों की पसंद संस्कृत पढ़ने की है तो हम उन्हें रोक नहीं सकते।
शामल आलम एक सरकारी स्कूल से पढ़े छात्र हैं और संस्कृत के शिक्षक बनना चाहते हैं। वे बड़े उत्साह से इस बात को कहते हैं कि वे संस्कृत के अच्छे जानकार हैं और वे बच्चों को पढ़ाएंगे। उनका कहना है कि वे बच्चों को पढ़ाएंगे भी और उनकी अच्छी नौकरी भी सुनिश्चित करेंगे।