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आग के बीच रहकर बुझाते हैं पेट की आग

Mon, 28 Apr 2014 11:29 AM IST
नीरज सिन्हा/झरिया से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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वे दिहाडी मजदूर हैं। जान हर वक्त हथेली पर होती है। पूरी बस्ती के नीचे सुलगती रहती है आग। तपिश से जब-तब झोपडियों की कच्ची दीवारें ढह जाती हैं। पल-पल धुआं और गैस उनकी सांसों में घुलता रहता है।
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झरिया बाजार से आगे बढते ही खंडहर में बदले रेलवे स्टेशन, केबिन और बंद पडी चिमनियां, जगह-जगह जमीन से निकलते धुएं और गैस ने हमें अहसास करा दिया था कि यही वो इलाका है, जहां सालों से धरती के नीचे धधक रही है आग और इन सबके बीच जिंदगी जीने की जद्दोजहद भी जारी है।

तकरीबन चार किलोमीटर पैदल चलकर हम झरिया के कुजामा कुम्हार बस्ती पहुंचे। दिहाडी मजदूर मणिशंकर का दडबानुमा घर इसी बस्ती में है।

आपके लिए वोट के मायने क्या हैं? अभी इतना ही पूछा था कि मणिशंकर बेबाकी से बोले, “वोट उनके (चुनाव लडने-जीतने वालों) लिए पर्व है, हमारे लिए मजबूरी। उनका भरेगा बक्सा और बढेगा बैंक बैलेंस। हम तो झुलसते रहेंगे इसी आग में। सच यह कि हम अपना आज भी जानते हैं और कल के बारे में भी पता है।"
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मणिशंकर जानना चाहते हैं कि पांच साला चुनावी पर्व की खुशी उन जैसे लोगों तक क्यों नहीं पहुंचती?

वे मानते हैं कि चुनावों का वक्त है। उनके जैसे आम लोगों के एक वोट से कोई संसद पहुंचता है, किसी की सरकारें बनती हैं, पर उनकी हालत नहीं बदलती।

सुबह साढे छह बज रहे होंगे, जब हम उनके घर पहुंचे थे। तब तक वे कई काम निपटा चुके थे। उन्होंने बताया कि उनके पास देर तक बात करने का समय नहीं है।

उनकी पत्नी दुलती देवी कहती हैं, सूरज तेज है। कोयला लेकर शहर की ओर जाना है। समय पर नहीं पहुंचे तो ग्राहक बिगड जाएगा। फिर पति-पत्नी कोयले भरी बोरियों को साइकिल पर लादते हुए खदानों, पहाडों के बीच से निकल पडते हैं शहर की ओर।
फुरसत नहीं

ढाई घंटे बाद उनकी पत्नी वापस लौटीं। उन्होंने बताया कि अब वो (मणिशंकर) 12 बजे तक लौटेंगे। घर के बाकी काम निपटाने के बाद दुलती अपने दरवाजे पर प्लास्टिक की बोरियों का ढेर लेकर बैठ गईं।

इन बोरियों का क्या करेंगी? यह पूछने पर कहा, इसे खरीदकर लाई हैं और उनकी सिलाई करेंगी। कुछ अपने काम आएंगे, बाकी बेच दी जाएंगी। एक बोरी पर डेढ–दो रुपए की कमाई हो जाएगी। ये बोरियां राख, कोयले, मिट्टी ढोने के काम आती हैं।

मणिशंकर के इंतजार में हमने बस्ती में कई लोगों से बातें की। पता चला कि झरिया के बडे इलाके में कोयला, मिट्टी और राख हजारों लोगों के जीने का जरिया है। बडी संख्या में लोग दिहाडी मजदूरी करते हैं। काम के लिए वे सुबह ही झरिया बाजार में खडे हो जाते हैं। इसे मजदूर मंडी कहा जाता है।

महिलाएं, जगह-जगह कोयले के चूरे से जलावन का गुल बनाती दिख जाती हैं और कई लोग बंद पडी खदानों से चोरी-छिपे कोयला निकालते हैं। दूसरे कुछ लोग उनसे कोयला खरीदकर शहरों के गली-मुहल्ले या दूसरी बस्तियों में बेचते हैं। लोग बताते हैं कि इन कामों के लिए तय ठिकानों पर सुरक्षाकर्मियों को नजराना भी देना पडता है।
संकट

इसी बीच हमारी मुलाकात झरिया की जिंदगी पर लिखते रहे लेखक तैयब खां से हुई। वे बताने लगे कि कुजामा पहले बडी और घनी बस्ती थी, मगर जलती हुई जमीन लगातार धंसती रही और लोगों को यहां से हटना पडा। कडवा सच यह है कि यहां विस्थापन का दर्द गहरा है।

वे बताते हैं कि गलत खनन नीतियों का बडा खमियाजा गरीबों को भुगतना पडा है। आग की वजह से रेलवे स्टेशन, कोयले की खदानें और वाशरी प्लांट बंद हो गए, तब से रोजी-रोटी का संकट और बढ गया।

इस बीच उधर से ही गुजरते वामपंथी नेता सुरेश प्रसाद गुप्ता भी हमसे मिले। वे बताते हैं, "झरिया की परेशानियां बढती जा रही हैं। शहर से दूर बेलगडिया में 12 सौ गरीब परिवारों के लिए घर तो बना दिया, लेकिन उनके रोजगार के लिए कोई उपाय नहीं किए गए। अब लोग उन घरों को भी छोड रहे हैं। अगर उन घरों में रहेंगे तो खाएंगे क्या?"

करीब सवा 12 बजे पसीने से तर-ब–तर मणिशंकर ने चेहरे पर पानी का छींटा मारने के बाद कुछ पल आराम किया। पत्नी से दोनों बच्चों सूरज और सागर के बारे में पूछा, तो पता चला वे रिजल्ट लेने स्कूल गए हैं।

वे बताते हैं कि गरीबी की वजह से खुद पढ नहीं सके, लेकिन उनके बच्चे जहां तक पढना चाहेंगे, वे उन्हें पढाएंगे। वे बता रहे थे कि जब आकाश पर तारे टिमटिमाते रहते हैं, उसी समय वे लोग जग जाते हैं।

कितनी कमाई कर लेते हैं? यह पूछने पर वे कहते हैं, सब कुछ सामने है। किसी दिन डेढ सौ, किसी दिन सौ। और कभी फाका। चुनावों से निराशा के बारे में वे कहते हैं कि कोई बडा आदमी या हैसियत वाला राजनेताओं के पास जाएगा, तो उसकी कद्र होगी लेकिन हाशिए पर खडे मेहनतकश, अपढ, गरीब, मजदूर के लिए राजनेताओं की नजरों में कोई कद्र नहीं है।

मणिशंकर राजनीति में चरित्र भी परखते हैं।

वो कहते हैं, “वोट के समय चुनाव लडने वाले गरीब-गुरबे के बच्चों को भी गोद में उठा लेंगे। अगर वो बच्चा पखाना-पेशाब कर दे तो मुस्कराकर रह जाएंगे। प्रचार के दौरान लोग गुस्से में कुछ भी कह दें, सह लेंगे। हमारा सवाल भी तो यही है कि चुनाव जीतने के बाद गरीबों के बच्चों को वो गोद में क्यों नहीं उठाते। उंगली में गिने लोग होंगे, जो हमारे जैसे लोगों का ख्याल करते हैं।"

लोकतंत्र
बातों का सिलसिला आगे बढा। मणिशंकर के ख्याल और भी खुलते चले गए। जब मैंने पूछा कि सरकार और एक चुने हुए जनप्रतिनिधि से आपकी उम्मीदें क्या होती हैं तो वे अपने अंदाज में बोले, “हमें कोई लाख, हजार रुपए तो देगा नहीं। हम यह मांगते भी नहीं। अगर एक दिन देह खटा नहीं सके, तो भूखे सोने की नौबत आती है। किसी के पास लाल कार्ड नहीं, तो किसी को वृद्धा पेंशन नहीं। बहुतों की जमीन धंस गई, मकान दफन हो गए।"

देश में तरक्की बहुत हुई है, क्या इस पर यकीन नहीं करते? यह सुनते ही उनका चेहरा तमतमा जाता है। सामने नदी में बहते काले पानी और गंदगी को वे दिखाते हुए कहते हैं, “दर्जन भर बस्ती के लोग यहीं नहाते हैं। बर्तन भी यहीं धोए जाते हैं। चार किलोमीटर दूर से लाना पडता है पीने का पानी। गरमी में जब लू के थपेडों के बीच आग की चिंगारियां उडती हैं, तो इन झोपडियों में रहने वालों की देह झुलसकर रह जाती है। क्या यही है तरक्की?”

इस आग प्रभावित इलाके से वे लोग हट क्यों नहीं जाते। मणिशंकर और उनकी पत्नी का कहना है कि कई बार जगह खाली करने के लिए नोटिस मिले हैं, लेकिन कहां जाएं। सिर छुपाने और पेट पालने का सवाल कोई मामूली तो नहीं।

झरिया कोल फील्ड बचाओ समिति के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक अग्रवाल कहते हैं कि झरिया ने देश को बहुत कुछ दिया, लेकिन बदले में देश ने झरिया को क्या दिया है। यह तो वही बात हुई कि "करोडों का कोयला, इंसानों का मोल कौडियों में।"

वे बताते हैं कि सरकारी महकमे की नजर में 56 हजार परिवार आग के ऊपर बसे हैं, लेकिन समिति का आकलन है कि कम-से-कम एक लाख परिवार आग पर बैठे हैं। अग्रवाल के मुताबिक राज्य सरकार का झरिया एक्शन प्लान धोखा है।
दोपहर का खाना

ढाई बज रहे हैं। इस बीच उनकी पत्नी ने हमसे भी कुछ खा लेने का अनुरोध किया। जब मैंने मना किया तो बोलीं, गरीब का घर है, कैसे खाएंगे? हम झेंप गए। इतना भर कहा,“ऐसा नहीं है।"
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वे लोग चार बजे तक घर से निकलने वाले हैं। बताया कि रात के लिए राशन–पानी खरीदेंगे और अगली सुबह के लिए काम का जुगाड लगाएंगे।

मणिशंकर की पत्नी दुलारी देवी के पास वोटर कार्ड नहीं है। वैसे उन्हें वोट देने में कोई दिलचस्पी नहीं। सरकार तो उन्हें निराश ही करती है।
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