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झारखंड के लिए तो दुमका ही है काशी

Wed, 23 Apr 2014 10:36 AM IST
आशीष झा, अमर उजाला, रांची
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झारखंड में तीसरे और अंतिम चरण का मतदान 24 अप्रैल को होगा। इस चरण में संथाल की तीन सीटों के अलावा धनबाद में वोट डाले जाएंगे।
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देश में चाहे लोगों की नजर काशी पर टिकी हो, लेकिन आदिवासी समाज दुमका को ही काशी मान रहा है। यहां से आदिवासियों के दो बड़े नेता शिबू सोरेन और बाबू लाल मरांडी मैदान में हैं।

ऐसे में यहां से जीतने वाला ही आदिवासियों का सबसे बड़ा नेता माना जाएगा। भाजपा के सुनील सोरेन यहां कमजोर उम्मीदवार हैं।

शिबू सोरेन जहां अपनी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री हैं, वहीं झाविमो के बाबूलाल मरांडी भी अपनी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री हैं।

दोनों के बीच ही कड़ा मुकाबला है। दुमका राज्य की उपराजधानी भी है, लेकिन कुछ कैबिनेट की बैठकों के अलावा यहां कुछ खास नहीं हुआ। ऐसे में विकास यहां सबसे बड़ा मुद्दा है। पिछले 14 साल में एक यूनिवर्सिटी को छोड़कर इस क्षेत्र को कुछ नहीं मिला।
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इस क्षेत्र में कारखाने नहीं खुले। यहां पलायन भी यहां एक बड़ा मुद्दा है। चार सीटों पर 24 अप्रैल को होने वाले मतदान में दुमका को छोड़ बाकी की तीनों सीटें अभी भाजपा के पास हैं।

ऐसे में भाजपा के लिए संथाल में साख बचाने की चुनौती है। गोडडा से भाजपा के निशिकांत दुबे इस बार मुश्किल में दिख रहे हैं। जेवीएम के प्रदीप यादव और कांग्रेस के फुरकान अंसारी ने यहां मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है।

राजमहल में भी भाजपा को जीत दोहराना आसान नहीं है। यहां भाजपा के देवीधन बेसरा का जेवीएम के विजय हंसदा से सीधा मुकाबला है। सीधा मुकाबला होने से बेसरा की परेशानी बढ़ गयी है। धनबाद में भाजपा के पशुपतिनाथ सिंह बहुकोणीय मुकाबले में फंसे हुए हैं।

यहां से कांग्रेस के अजय दुबे, जेवीएम के समरेस सिंह और तृणमूल के चंद्रशेखर दुबे उर्फ ददई दुबे मैदान में हैं। ददई कहने को पलामू से हैं लेकिन धनबाद में इन्होंने काफी समय गुजारा है। पूर्व सांसद भी रह चुके हैं।

इसी प्रकार कांग्रेस के अजय दुबे पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन विस्थापितों के बीच इनकी लोकप्रियता काफी है। माफिया और बाहुबली होने के कारण यह सभी प्रकार से टक्कर देने में सक्षम दिख रहे हैं। जेवीएम के समरेस सिंह यहां मुकाबले को बहुकोणीय बनाने में सफल रहे हैं।
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जीत-हार का फैसला काफी कम वोटों के अंतर से होगा। भाजपा को वोटों के ध्रुवीकरण की उम्मीद है। पिछले चरण में भी जमशेदपुर में अंतिम समय में हुए ध्रुवीकरण के कारण भाजपा की स्थिति बेहतर बतायी जा रही है। ऐसे में कहा जा सकता है कि भाजपा झारखंड में अपनी पुरानी सीट बचा न सके लेकिन पुराने आंकड़े जरूर पा लेगी।
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