नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (एनयूएसआरएल) रांची ने झारखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्र मांदर के लिए भौगोलिक संकेतक (जीआई) पंजीकरण प्राप्त किया है। विश्वविद्यालय अपनी डीपीआईआईटी आईपीआर चेयर के माध्यम से कानूनी विशेषज्ञता, सांस्कृतिक संरक्षण और स्थानीय उत्पादक समुदायों के हितों को परस्पर जोड़ने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। इसका मकसद विशेष भौगोलिक क्षेत्रों, स्थानीय परंपराओं और समुदायों से जुड़े पारंपरिक उत्पादों को उपयुक्त कानूनी संरक्षण प्रदान करना है।
मांदर को जीआई पंजीकरण मिलना राज्य की सांस्कृतिक विरासत, समृद्ध लोक परंपराओं, लोकसंगीत और सामुदायिक जीवन के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह जीआई संरक्षण उत्पाद की भौगोलिक पहचान को स्थापित करने, पारंपरिक विशेषताओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने और पारंपरिक कारीगरों तथा उत्पादक समुदायों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में मदद करेगा।
मांदर के जीआई पंजीकरण की प्रक्रिया
रायडीह मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लि. ने मांदर के लिए जीआई आवेदन सितंबर 2021 को दाखिल किया था। इस प्रक्रिया में विश्वविद्यालय ने अनुसंधान, दस्तावेजीकरण, कानूनी तथा प्रक्रियागत सहयोग, संबंधित हितधारकों के साथ समन्वय और जीआई रजिस्ट्री से जुड़े कार्यों में महत्वपूर्ण संस्थागत एवं सहयोगात्मक भूमिका निभाई। बौद्धिक संपदा अधिकार विशेषज्ञ एवं विश्वविद्यालय के विजिटिंग फैकल्टी डॉ. सत्यदीप सिंह ने भी आवेदन से संबंधित दस्तावेजीकरण, प्रक्रियागत आवश्यकताओं, जीआई रजिस्ट्री के समक्ष प्रस्तुतीकरण और सुनवाई से जुड़े कार्यों में अपना अहम योगदान दिया। मांदर झारखंड के लोकसंगीत और सामुदायिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है। जीआई पंजीकरण मिलने से इससे जुड़े पारंपरिक कारीगरों और उत्पादक समूहों की पहचान को कानूनी मजबूती प्राप्त होगी।
पैटकर पेंटिंग और देवघर पेड़ा प्रयास
मांदर की इस सफलता के बाद विश्वविद्यालय झारखंड के दो अन्य विशिष्ट पारंपरिक उत्पादों के जीआई पंजीकरण के लिए भी सक्रियता से कार्य कर रहा है। इनमें पूर्वी सिंहभूम की पैटकर पेंटिंग और देवघर का प्रसिद्ध पेड़ा शामिल है। पैटकर पेंटिंग राज्य की पारंपरिक कलात्मक अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग है।
आवेदकों ने पैटकर पेंटिंग ऑफ ईस्ट सिंहभूम के लिए जीआई आवेदन संख्या 712, 9 अक्तूबर 2020 को दाखिल किया था। विश्वविद्यालय इस आवेदन से संबंधित अनुसंधान, दस्तावेजीकरण, कानूनी अनुवर्ती कार्रवाई और प्रक्रियागत आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है। इसके साथ ही, देवघर से जुड़े पारंपरिक खाद्य उत्पाद देवघर पेड़ा के लिए जीआई आवेदन संख्या 1043, 10 जनवरी 2023 को दाखिल हुआ था। यह आवेदन वर्तमान में जीआई रजिस्ट्री की परीक्षण एवं पंजीकरण संबंधी प्रक्रियाओं के अधीन है, जिसमें विश्वविद्यालय आवश्यक अनुवर्ती प्रक्रियाएं पूरी कर रहा है।
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बौद्धिक संपदा तंत्र के विस्तार प्रयास
विश्वविद्यालय परिसर में चैंपियन एमएसएमई योजना के अंतर्गत आईपी सुविधा केंद्र भी काम कर रहा है। यह केंद्र सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों सहित पात्र हितधारकों के बीच बौद्धिक संपदा अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का कार्य करता है। विश्वविद्यालय कानूनी अनुसंधान, बौद्धिक संपदा विशेषज्ञता और स्थानीय उत्पादक समुदायों के साथ समन्वय के माध्यम से राज्य में एक मजबूत बौद्धिक संपदा पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर रहा है।
इसके लिए विश्वविद्यालय प्रशासन पारंपरिक कारीगरों, उत्पादक समूहों, सहकारी संस्थाओं, सामुदायिक संगठनों और उद्यमियों को डीपीआईआईटी आईपीआर चेयर से मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर डॉ. अशोक आर. पाटिल के अनुसार विश्वविद्यालय झारखंड की संस्कृति, परंपरा और धरोहर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने और बौद्धिक संपदा अधिकारों के माध्यम से सशक्त बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।