झारखंड की राजधानी रांची से सटे जिले खूंटी जाने के लिए जब निकला, तो चुनावी प्रचार का शोर ख़ूब सुनाई पड़ा, लगा वाकई चुनाव अपने रंग पर है। पौने घंटे में ही हम शहरी भीड़ से दूर राष्ट्रीय राजमार्ग पर थे।
अचानक पुलिसकर्मियों ने रुकने का इशारा किया। हमने उनसे पूछा क्या खूंटी में प्रवेश कर चुके हैं, जवाब मिला, "बिल्कुल आप खूंटी में हैं।"
उन्होंने तलाशी ली, फिर जाने को कहा। चलते- चलते मन में सवाल घूम गए कि खूंटी में क्यों पसरा है ख़ौफ़ का साया।
माओवादियों के फ़रमान का असर
खूंटी पहुंचे, तो पता चला कि कथित माओवादियों ने शहर में भी दस्तक दी है। कई जगहों पर उन्होंने वोट बहिष्कार के पोस्टर और बैनर लगाए हैं। पखवाड़े भर पहले ही माओवादियों ने खूंटी के एक गांव में पुलिस वाहन को बारूदी सुरंग विस्फोट में उड़ा दिया था।
छोटे से क़स्बाई शहर की सड़कों पर नज़रें दौड़ाई, तो राजनीतिक दलों के इक्का-दुक्का होर्डिंग्स, कटआउट ही नज़र आए। प्रचार के लिए भोंपू का शोर भी बहुत कम। अलबत्ता रामनवमी को लेकर महावारी पताकाओं से शहर ज़रूर अटा पड़ा था।
दहशत के साए में चुनाव
एक राजनीतिक कार्यकर्ता ने नाम नहीं लिखने के भरोसे पर बताया कि खूंटी, तोरपा के बड़े ग्रामीण इलाकों में चुनावी प्रचार करने के लिए राजनीतिक दलों के उम्मीदवार, कार्यकर्ता अब तक नहीं पहुंच सके हैं। राजनीतिक कार्यकर्ताओं को कथित माओवादी संगठन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर धमकाते रहे हैं।
उनका कहना था कि सुदूर इलाकों में मतदान पुलिस बलों की तैनाती पर निर्भर करता है और वोट किसे मिलेगा यह बहुत हद तक माओवादियों के फ़रमान पर निर्भर करता है। तो क्या हथियरबंद दस्ते उम्मीदवारों, दलों की मदद करते हैं? कार्यकर्ता का जवाब था, "निश्चित तौर पर। जिसकी हथियारबंद दस्ते से सेटिंग तगड़ी हुई, वही जंगल, पहाड़ के गांवों का वोट पाएगा।"
कौन से इलाके हैं ज्यादा खतरनाक ?
रविवार को बीरबांकी गांव में आम आदमी पार्टी के आधा दर्जन कार्यकर्ताओं को चुनाव प्रचार करने के दौरान संदिग्धों ने अपने क़ब्ज़े में ले लिया था। क़रीब 18 घंटे बाद सभी कार्यकर्ता किसी तरह संदिग्धों की घेराबंदी से निकलकर वापस खूंटी लौटे।
'आप' की उम्मीदवार दयामणि बारला कहती हैं कि उन लोगों को लगातार डराया-धमकाया जा रहा है। वह बताती हैं कि खूंटी के ग्रामीण इलाकों में भय दहशत का माहौल है। खूंटी संसदीय क्षेत्र के लिए 17 अप्रैल को वोट डाले जाने हैं। आदिवासियों के लिए यह आरक्षित सीट है।
इस संसदीय क्षेत्र में छह विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें खूंटी जिले का खूंटी, तोरपा, रांची जिले का तमाड़, सिमडेगा जिले के सिमडेगा, कोलेबिरा के अलावा सरायकेला खरसावां विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। सरायकेला को छोड़कर सभी विधानसभा क्षेत्र नक्सल प्रभावित हैं, जबकि खूंटी सबसे खतरनाक है।
कैसी है सुरक्षा व्यवस्था?
यह वही खूंटी है जहां जयपाल सिंह मुंडा, एनइ होरो सरीखे आदिवासी नेता हुए। भाजपा के करिया मुंडा यहां से सात बार चुनाव जीते हैं। इस बार भी वे चुनाव लड़ रहे हैं।
चुनावों के मद्देनज़र केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी खूंटी को अति संवेदनशील बताते हुए राज्य सरकार और पुलिस को सतर्क करते हुए एहतियात बरतने को कहा है।
दक्षिणी छोटानागपुर प्रक्षेत्र के आरक्षी उपमहानिरीक्षक प्रवीण सिंह बताते हैं, "खूंटी अति संवेदनशील इलाक़े के रूप में चिन्हित है कथित माओवादी संगठन लगातार वोट बहिष्कार पर जोर दे रहे हैं। बहुत जल्दी खूंटी में बड़ी तादाद में पुलिस बलों की तैनाती की जाएगी। वोटरों के बीच से डर दूर किया जाएगा। पुलिस ने इसकी रणनीति तैयार कर ली है।"
उम्मीदवार भी हैं परेशान
आजसू पार्टी के उम्मीदवार नियेल तिर्की कहते हैं कि एक ख़ास उम्मीदवार के इशारे पर ही कथित हथियारबंद दस्ते दूसरे दलों के उम्मीदवार को परेशान कर रहे हैं। झारखंड विकास मोर्चा के ज़िला अध्यक्ष दिलीप मिश्रा के मुताबिक़ शहर से बाहरी इलाक़ों में चुनाव प्रचार करने जाना सुरक्षित नहीं है।
दहशत और ख़ौफ़ को समझने के लिए हम खूंटी के सुदूर गांवों तक पहुंचे। खूंटी से तैमारा की दूरी 30 किलोमीटर है। सड़क अच्छी है, पर दूर-दूर तक सन्नाटा नज़र आता है। रास्ते में कोई मिला भी तो उसने खुलकर बात करने से कन्नी काट ली।
रास्ते में चुनाव प्रचार का एक भी वाहन नहीं दिखा और न ही गांव की गलियों में कोई ऐसा नज़ारा कि भोंपू के शोर के पीछे बच्चे भाग रहे हैं- लाल-पीला हरा पंपलेट लूटने के ख्याल से।
धमकी से परेशान लोग
टोडंगकोल, हितूटोला गांव से गुजरते हुए हम बिरजला गांव पहुंचे। कुछ महिलाएं पेड़ों के नीचे इमली चुन रही थीं। गांव के युवक थॉमस बताते हैं कि डर से प्रचार करने वाले इधर नहीं आते। उन लोगों (हथियारबंद दस्ता) ने वोट बहिष्कार की धमकी दे रखी है।
बिरजला से थोड़ी दूर पर मारंगहदा गांव में साप्ताहिक हाट लगा था। ग्रामीणों से बातचीत में पता चला कि अब पहले जैसे दिन नहीं रहे। सांझ ढलने से पहले लोग घरों को लौटने लगते हैं। वजह, आसपास कई दफा हत्या की वारदात हुई है।
आबादी के हिसाब से खूंटी झारखंड का छोटा ज़िला है, लेकिन अपराध और नक्सली हिंसा की घटनाओं पर ग़ौर करें, तो यह संवेदनशील हैं। साल 2008 से 2013 यानी छह साल में कुल छह सौ हत्याएं हुई हैं, इनमें अकेले नक्सली हत्याओं की संख्या 109 हैं। छह साल में खूंटी जिले के पुलिस थानों में नक्सलियों से जुड़े 210 मुक़दमे दर्ज किए हैं।
खूंटी में सबसे ज्यादा असर
अपराध और नक्सली वारदातों पर लिखते रहे हिन्दी दैनिक प्रभात खबर के संवाददाता सुरजीत सिंह बताते हैं कि भौगोलिक इलाका दुरूह होने की वजह से कथित माओवादी संगठनों ने खूंटी को अपना ठिकाना बना लिया है।
संगठनों के बीच वर्चस्व की लड़ाई में लगातार हिंसक घटनाएं होती रही हैं। इससे भी ख़ौफ़ बढ़ा है। यहां संगीनों के साए में ही वोट पड़ेंगे। मारंगहदा हाट से आगे बढ़ने पर एक आदिवासी बुजुर्ग सोनो हास्सा से बात होने लगी। वह मुंडारी भाषी थे।
उनकी कसक यह कि क्रांतिकारी बिरसा मुंडा की धरती पर हिंसा, ख़ौफ़, दहशत हावी हो गई है। उन्होंने कहा, "अब सांझ ढलते जंगलों, पहाड़ों में ढोल, मांदर की आवाज़ भी सुनाई नहीं पड़ती हैं। आदिवासी इलाक़ा अशांत हो गया है।"
दहशत से निजात कब ?
मारंगहदा हाट से दूसरी रास्ता पर आगे बढ़े, तो सपारोम गांव मिला। गांव के बिरसा मुंडा, चंदापाहन और रतन सिंह मुंडा एक पत्थर पर बैठे थे, बाकी कुछ बच्चे खेल रहे थे। रतन सिंह मुंडा ने बताया कि कुछ दिन पहले चुनाव प्रचार करने वाले उधर से गुज़रे तो थे लेकिन रुके नहीं। उसके बाद कोई नहीं आया।
मारंगहादा रोड पर ही लुपुंगडीह गांव है। सड़क किनारे सरकारी स्कूल है। स्कूल के बोर्ड पर भाकपा माओवादी का पोस्टर लगा है। लेकिन कोई उसे हटाने की हिम्मत नहीं करता। दो दिन के दौरे में हम दर्जनों गांवों से गुज़रे और इस दरम्यान इक्का-दुक्का राजनीतिक कार्यकर्ता ही नज़र आए। वह भी डरे-सहमे या खतरे वाले इलाकों से बच निकलने की हड़बड़ी में।
प्रचार गाड़ियों में झंडे-पोस्टर भी नहीं दिखे। कहीं कोई बड़ा नेता नजर नहीं आया और न तो आम, इमली, महुआ के पेड़ों के नीचे पहले की तरह आदिवासियों की कोई सभा, बैठकें दिखीं और न ही नेताओं के स्वागत के लिए चना, गुड़ पानी, साल के फूल दिखे।