तेज भागती जिंदगी और सामाजिक, आर्थिक तानेबाने के बदलने से समाज में मानसिक परेशानियां बढती जा रही हैं, 'रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो साइकिएट्री एंड एलायड साइंसेज' (रिनपास) के आंकडे यही बताते हैं।
12 साल पहले (2001-02) मानसिक अस्पताल में इलाज के लिए 16 हजार 175 मरीज आए थे। साल 2012-13 में इनकी संख्या बढकर 90 हजार 716 हो गई, ये संख्या ओपीडी की है।
इस साल अप्रैल से सितंबर तक छह महीने में 47 हजार 217 लोग इलाज कराने आ चुके हैं। अमूमन इलाज कराने वालों में 30 फीसदी युवा वर्ग से आते हैं।
मानसिक तौर पर परेशान इंसान जब नियंत्रण से बाहर होते हैं, तब उन्हें भर्ती किया जाता है। अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती किए जाने वाले मरीजों की संख्या भी लगातार बढ रही हैं।
साल 2001-02 में मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती किए जाने वाले मरीजों की संख्या जहां 1297 थी, वहीं 2012-13 में ये संख्या बढकर 2494 हो गई।
अभी अस्पताल में 610 मानसिक रोगी भर्ती हैं। रिनपास के निदेशक डॉक्टर अमूल रंजन सिंह के मुताबिक इनमें लगभग 40 फीसदी महिलाएं हैं। ओपीडी में भी इलाज कराने वाली महिलाओं की औसत संख्या ऐसी ही है।
रिनपास के मनोचिकित्सक महीने में चार दिन झारखंड में चार जगहों - जोन्हा, खूंटी, सरायकेला और हजारीबाग में कैंप लगाकर मनोरोगियों का इलाज करते हैं।
आंकडे बताते हैं कि साल 2001 में शिविरों में इलाज कराने वालों की संख्या जहां 1321 थी, वहीं साल 2012-13 में ये संख्या बढकर 30,812 हो गई।
'इलाज की सुविधाएं बढी'
हालांकि रिनपास के निदेशक डॉक्टर अमूल रंजन सिंह का कहना है कि समाज में जागरूकता बढने, नई दवाइयों के इजाद होने और इलाज की बेहतर सुविधाओं की वजह से मरीजों की संख्या बढी है।
उनका कहना है कि अब लोग अस्पताल में इलाज कराने से संकोच नहीं करते और गांवों में चिकित्सा कैंप लगवाने के लिए भी लोग अस्पताल पहुंचने लगे हैं।
उनका कहना है कि तनाव, अवसाद, स्लीपिंग डिसऑर्डर, याददाश्त जाना, स्कित्जोफ्रेनिया और नशे की लत जैसे लक्षण ज्यादा सामने आ रहे हैं।
डॉक्टर अमूल रंजन सिंह कहते हैं, "एकैडमिक दबाव, बेहतर रोजगार पाने और महत्वाकांक्षा के कारण युवा वर्ग तनाव से गुजर रहा है।"
इलाज कराने आए एक युवक जीतेंद्र सिंह से हमारी बात हुई। वे बीए पार्ट टू के छात्र हैं। वे बताते हैं कि उन्हें बहुत तनाव रहता है और किसी काम में मन नहीं लगता। लगता है कि वे कुछ खोते जा रहे हैं।
रिनपास के असिस्टेंट प्रोफेसर कप्तान सिंह सेंगर कहते हैं, "जिंदगी की रफ्तार तेज होती जा रही हैं। कम समय में ज्यादा से ज्यादा हासिल करने की प्रवृति बढी है। लिहाजा जब तनाव एक स्तर से ज्यादा हो जाता है तो यह डिप्रेशन में बदल जाता है।"
'गांवों का टूटता तानाबाना'
मानसिक रोग विशेषज्ञ मानते हैं कि गांवों में सामाजिक, आर्थिक तानाबाना बदलने से परेशानियां बढी हैं। परिवार टूट रहे हैं, बेरोजगारी और अशिक्षा की वजह से भी मानसिक परेशानियां बढ रही हैं।
बिहार के भभुआ से अपने बेटे भरत का इलाज कराने के लिए संतोष तीन साल से रिनपास आ रही हैं।
उन्होंने बताया कि उनके बेटे मजदूरी करते हैं और परिवार चलाने का जिम्मा उन्हीं के कंधों पर है।
बिहार के खगडिया से इलाज कराने आए 16 साल के अंकित अस्पताल के एक कोने में गुमसुम बैठे है।
अंकित पूछने पर बताते हैं कि उन्हें कुछ याद नहीं रहता। गरीबी की वजह से वो केवल आठवीं तक ही पढ पाए। डॉक्टर कहते हैं कि इलाज से अंकित पूरी तरह ठीक हो सकते हैं।
'आदिवासी भी परेशान'
रिनपास में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि झारखंड के 21 से 40 साल की उम्र के आदिवासी युवाओं में मनोरोग की समस्या ज्यादा है।
रिनपास के सामाजिक मनोचिकित्सक राजकिशोर मुंडा ने 389 आदिवासी मनोरोगियों को अध्ययन में शामिल किया।
राजकिशोर मुंडा ने बताया कि 10 फीसदी से ज्यादा लोग डिप्रेशन और 22 फीसदी से ज्यादा लोग स्कित्जोफ्रेनिया से पीडित थे।
राजकिशोर मुंडा के मुताबिक अध्ययन में पता चला है कि आजाद जीवन जीने वाले आदिवासी युवाओं पर जब जिम्मेदारी बढती है तो वे मानसिक संतुलन खो बैठते हैं।
कई मनोरोगियों और उनके परिजनों से बातचीत करने पर यह तथ्य भी उभर कर सामने आए कि गांवों में मानसिक परेशानी को रोग समझने के बजाय कुदरती परेशानी माना जाता है।
इसके बाद लोग लंबे समय तक ओझा-गुनी, झाड-फूंक के चक्कर में रहते हैं और फिर अस्पताल आते हैं।
हालांकि डॉक्टर कप्तान सिंह सेंगर का कहना है कि अब परिस्थितियां बदल रही हैं। वो बताते हैं कि समय पर और नियमित तौर पर दवा खाने से 40 फीसदी रोगी सामान्य जीवन हासिल कर लेते हैं।
(पहचान छिपाने के लिए कुछ मरीजों और उनके परिजनों के नाम बदल दिए गए हैं।)