रांची। झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राजेश शंकर की अदालत ने राज्य सरकार को नेशनल जेनरिक डॉक्यूमेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम यानी एनजीडीआरएस पोर्टल पर दर्ज प्रतिबंधित जमीनों की सूची को तुरंत हटाने का कड़ा निर्देश दिया है। अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि जमीन से जुड़े दस्तावेज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 और बिहार रजिस्ट्रेशन रूल्स, 1937 के तहत तय की गई सभी शर्तों को पूरा करते हैं, तो राज्य के सब-रजिस्ट्रार जमीन की रजिस्ट्री करने से मना नहीं कर सकते हैं।
साथ ही, अदालत ने राज्य के राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव को निर्देश दिया है कि वे इस फैसले के आलोक में झारखंड के सभी जिलों के उपायुक्तों के लिए आवश्यक सर्कुलर अविलंब जारी करें।
निबंधन अधिकारियों के अधिकारों पर अदालत का रुख
उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान सब-रजिस्ट्रार के अधिकारों और सीमाओं को रेखांकित किया। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि निबंधन अधिकारी का मूल काम केवल प्रस्तुत किए गए दस्तावेज का निबंधन करना है। सब-रजिस्ट्रार को किसी भी जमीन के मालिकाना हक का फैसला करने की कानूनी शक्ति या अधिकार प्राप्त नहीं है। कोई अधिकारी यह तय नहीं कर सकता कि विक्रेता के पास उस जमीन का वैध मालिकाना हक है अथवा नहीं।
अदालत ने कहा कि यदि किसी जमीन की खरीद-बिक्री से संबंधित दस्तावेज सभी निर्धारित कानूनी और प्रक्रियागत शर्तों का पूर्ण रूप से पालन करते हैं, तथा उनके लिए आवश्यक स्टांप शुल्क और निबंधन शुल्क का भुगतान कर दिया गया है, तो सब-रजिस्ट्रार उस जमीन की रजिस्ट्री रोकने का कोई आधार नहीं बना सकते। अदालत ने अपने आदेश में यह भी जोड़ा कि महज किसी दस्तावेज की रजिस्ट्री हो जाने से किसी व्यक्ति को उस जमीन पर स्वतः ही कानूनी और वैध मालिकाना हक प्राप्त नहीं हो जाता है।
झारखंड हाईकोर्ट यह पूरा मामला याचिकाकर्ता अमित रंजन द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता ने हजारीबाग जिले के बोंगा गांव स्थित खाता संख्या 154 और प्लॉट संख्या 2606 के अंतर्गत आने वाली अपनी 42 डिसमिल जमीन को एनजीडीआरएस पोर्टल पर दर्ज प्रतिबंधित जमीनों की सूची से तुरंत बाहर करने का आग्रह किया था।
याचिका में बताया गया था कि याचिकाकर्ता की निजी जमीन का नाम निबंधन अधिनियम की धारा 22-ए के तहत बनाई गई प्रतिबंधित सूची में दर्ज कर दिया गया था।
इस समस्या के समाधान के लिए हजारीबाग के उपायुक्त के समक्ष बाकायदा आवेदन पत्र भी समर्पित किया गया था। इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर इस विषय पर कोई उचित कदम नहीं उठाया गया और न ही कोई कार्रवाई की गई। परेशान होकर याचिकाकर्ता को न्याय के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय और झारखंड उच्च न्यायालय के पूर्व में दिए गए फैसलों का भी हवाला दिया गया।
कानूनी सिद्धांत पूर्ण रूप से बाध्यकारी
अदालत ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि झारखंड उच्च न्यायालय की खंडपीठ पहले ही निबंधन अधिनियम की धारा 22-ए तथा 26 अगस्त 2015 को जारी की गई अधिसूचना को पूरी तरह से रद्द कर चुकी है। खंडपीठ के उस निर्णय में बिहार सरकार द्वारा बनाए गए कानूनी प्रावधानों को झारखंड राज्य में अपनाए जाने तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय किए गए कानूनी सिद्धांतों को पूर्ण रूप से बाध्यकारी माना गया था।
उच्च न्यायालय के इस आदेश से राज्य के निबंधन कार्यालयों में जमीन की निबंधन प्रक्रिया को नियमानुसार पूरा करने में सहायता मिलेगी। राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव द्वारा जारी किए जाने वाले सर्कुलर के माध्यम से राज्य के सभी उपायुक्तों को अदालत के आदेशों का पालन करने की हिदायत दी जाएगी।