झारखंड उच्च न्यायालय ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ मुखौटा कंपनियों और खनन पट्टे से संबंधित दो जनहित याचिकाएं (पीआईएल) सुनवाई योग्य रखी हैं। न्यायालय ने अपने 79 पन्नों के फैसले में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और मुकुल रोहतगी की दलीलों को खारिज कर दिया, जिसमें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनके सहयोगियों के खिलाफ दायर दो जनहित याचिकाओं की सुनवाई पर सवाल उठाया।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि प्रतिवादी वकीलों ने इस आधार पर जनहित याचिकाओं पर आपत्ति जताई है - पहला, उन्होंने तर्क दिया कि जनहित याचिका झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार दायर नहीं की गई है। दूसरा, याचिकाकर्ता शिव शंकर शर्मा ने झारखंड उच्च न्यायालय के नियमों के तहत आवश्यक प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया है।
तीसरा, रिट याचिकाएं दुर्भावनापूर्ण इरादे से दायर की गई हैं क्योंकि रिट याचिकाकर्ता के पिता सीएम के पिता शिबू सोरेन के खिलाफ स्थापित एक आपराधिक मामले में गवाह थे, जिसमें उन्हें निचली अदालत ने दोषी ठहराया था।
चौथा, रिट याचिकाकर्ता दंड प्रक्रिया संहिता के तहत उपलब्ध उपाय को समाप्त किए बिना सीधे उच्च न्यायालय पहुंचा है। और अंत में, चूंकि पट्टा मुख्यमंत्री द्वारा पहले ही सरेंडर कर दिया गया है, इस कार्यवाही को जारी रखने का कोई मतलब नहीं है। वहीं कोर्ट ने
आपत्तियों को बिंदु-दर-बिंदु खारिज कर दिया और इस पर अपनी प्रतिक्रिया भी दी।