झारखंड के 24 जिले नक्सल प्रभावित हैं यानी इन इलाकों में माओवादी छापामारों और सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष चल रहा है। झारखंड की विडंबना यह है कि इस समस्या से ज़्यादातर जंगल के इलाके ही प्रभावित हैं।
इस राज्य के जंगलों में एक कहावत है कि इन जंगलों में हाथी भी हैं और 'साथी' भी। 'साथी' यानी माओवादी।
जंगलों में चल रहे संघर्ष और और समय-समय पर हो रहे बारूदी सुरंगों के विस्फोट का असर वन्य जीवों पर भी पड़ा है। चाहे वो सिंहभूम हो, संथाल परगना, पलामू या हजारीबाग- ये सारे इलाके हाथियों के गलियारे में शामिल हैं।
पूर्वी सिंहभूम के दलमा में तो हाथियों के संरक्षण के लिए केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित 'प्रोजेक्ट एलीफैंट' भी चल रहा है।
मगर इसके बावजूद हाथियों और इंसानों के बीच द्वंद्व बढ़ता ही रहा है। मसलन पलामू में बेतला के जंगलों पर नक्सलियों का राज है। इसके आसपास इलाकों जैसे खूंटी, गुमला, लोहरदग्गा, सिमडेगा और लातेहार में माओवादियों से अलग हुए धडों का भी ख़ासा असर है।
नक्सलविरोधी अभियान
कहीं माओवादियों और उनसे अलग हुए धड़ों की पुलिस से झड़पें, तो कहीं माओवादियों और इन धड़ों में आपसी गोलीबारी ने जंगल के निज़ाम को ही बदलकर रख दिया है।
2012 की शुरुआत में सुरक्षा बलों ने पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा के जंगलों में माओवादियों के खिलाफ ज़ोरदार अभियान चलाया था। अभियान के बाद सरकार ने यह कहते हुए सारंडा के अभियान को एक मॉडल के रूप में पेश किया कि अब यहां के जंगलों से माओवादियों को खदेड़ दिया गया है।
हालांकि सरकार के इस अभियान पर उंगलियां उठने लगीं हैं। मगर लगातार इन जंगलों में गोलीबारी की वजह से सारंडा के जंगलों में घूमने वाले हाथियों के झुंड पडोसी राज्य ओडिशा में जा घुसे।
ओडिशा के वन विभाग के अधिकारी पीके ढोला के अनुसार, इस साल जून में हाथियों का जो झुंड राऊरकेला शहर में घुसा था, वो सारंडा के जंगलों से ही आया है।
झारखंड से भागे हुए हाथी अब ओडिशा के लिए सिरदर्द की वजह बन चुके हैं। सारंडा के जंगलों में अभियान के बाद ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के कुआरमुंडा के इलाके में रहने वाले लोगों का जीना मुहाल हो गया है।
कुआरमुंडा की कालूसीरा पंचायत के सरपंच बिक्रम ओराम का कहना है कि झारखंड के जंगलों में हो रहे संघर्ष का सीधा असर वहां के रहने वाले वन्य प्राणियों पर पड़ा है।
झारखंड और ओडिशा की सीमा पर मौजूद सुंदरगढ़ से भारतीय जनता पार्टी के विधायक रहे शंकर ओराम ने बीबीसी को बताया, "हाथियों का ये कॉरीडोर यानी गलियारा हुआ करता था। यहां जंगल आपस में जुड़े हुए हैं। मगर जो कुछ जंगलों में हो रहा है, उससे अब यह गलियारा ध्वस्त हो चुका है। झारखंड के जंगलों से हाथी भी भाग गए हैं और साथी भी।"
इंसानों और हाथियों में चल रहे संघर्ष का जायजा लेने मैं झारखंड के रामगढ जिले के गोला इलाके में पहुंचा, जहां कुछ दिनों पहले करंट लगने से एक हाथी की मौत हो गई थी। यहीं कुछ लोगों को भी हाथियों ने कुचलकर मार दिया था।
बैतूलकलां पंचायत के सरपंच जाकिर मुझे उन इलाकों में ले गए, जहां हाथियों ने फसलों और घरों को नुकसान पहुंचाया था।
छत्तीसगढ़ और ओडिशा से यहां हालात कुछ बेहतर नहीं कहे जा सकते। यहां भी लोग रातों को जाग-जागकर अपनी फसलों और घरों पर पहरा देते हैं।
जाकिर और उनकी पंचायत के ग्रामीणों का कहना था कि जंगलों में हाथियों के खाने का इंतज़ाम सरकार को करना चाहिए।
उनका कहना था कि 'प्रोजेक्ट एलीफैंट' जैसी योजना इसीलिए शुरू की गई ताकि हाथियों के लिए जंगल के अंदर ही संसाधन बनाए जाएं, जिससे उनके भोजन और रहने के लिए जंगल में ही इंतज़ाम किया जा सके।
मगर उनका कहना है कि लाखों रुपए खर्च करने के बावजूद हाथियों के गलियारों के संरक्षण के लिए कुछ भी नहीं किया गया।
हाथियों की दो प्रजाति
झारखंड में वन विभाग के प्रमुख एके मिश्र ने बताया कि राज्य में हाथियों की संख्या 600 से 700 के बीच है, जो दो अलग-अलग प्रजातियों के हैं। इनमें से एक सरगुजा के हाथी कहलाते हैं, जो छत्तीसगढ़ से झारखंड आवाजाही करते हैं।
वे बताते हैं, "दूसरी प्रजाति है सिंहभूम के हाथियों की, जो स्वभाव से उग्र होते हैं। हाथियों की जब संख्या बढी तो उन्होंने भी अपने गुट बना लिए और अलग-अलग घूमने लगे। जंगलों में लोगों के अतिक्रमण की वजह से हाथियों के गुट दूसरे इलाकों में भी फैल गए, जो इनके गलियारे नहीं हुआ करते थे। यही वजह है कि इंसानों और हाथियों के बीच संघर्ष चल रहा है।''
मिश्र का कहना है कि झारखंड के जंगलों में रहने वाले आदिवासी महुए से शराब बनाते हैं। इसकी खुशबू भी हाथियों को आदिवासियों के घरों तक खींच लाती है। कभी-कभी हाथियों के झुंड सिर्फ शराब पीने के लिए घरों को तोडकर घुस जाते हैं।
झारखंड के वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस साल में इंसानों और हाथियों के संघर्ष में 400 लोग मारे जा चुके हैं। इनमें सबसे ज्यादा लोग सिंहभूम और संथाल परगना के इलाक़े में मारे गए हैं।
संघर्ष की घटनाओं में लगातार बढोतरी के मद्देनज़र, राज्य सरकार ने विशेषज्ञों के एक विशेष दल का गठन किया है। इनमें पडोसी राज्य पश्चिम बंगाल के विशेषज्ञ भी शामिल हैं, जिन्हें राज्य सरकार समय-समय पर मदद के लिए बुलाती है।
वैसे अब वन विभाग ने जंगलों के किनारे तार लगाने की योजना बनाई है, ताकि हाथियों को आबादी में घुसने से रोका जा सके। यह योजना उन इलाकों के लिए भी है, जहां जंगल से होकर रेल की पटरियां गुज़रती हैं। इस साल अगस्त में धनबाद रेलमंडल के मतारी स्टेशन के पास एक हाथी की ट्रेन से टकराकर मौत हो गई थी। हाथियों के ट्रेन से कटने की घटनाएं झारखंड में आम हैं।
इसे देखते हुए एक पीआईएल पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड और ओडिशा राज्यों को नोटिस भेजकर इन घटनाओं को रोकने के लिए किए जा रहे उपायों का ब्योरा मांगा है।