“गरीब घर की लड़की जब बड़ी होने लगती है, तो रातों की नींद उड़ने लगती है बाबू”। ये शब्द हैं नवीं कक्षा में पढ़ने वाली 14 साल की ममता के माता-पिता के। ममता की शादी तय हुई थी लेकिन उसने कम उम्र में शादी से इनकार कर दिया।
इसके बाद से झारखंड में गुमला के सुदूर हापामुनी गांव की ममता सुर्खियों में है। ममता के इरादे मजबूत हैं पर जेहन में एक फिक्र भी। शादी से इनकार करने के बाद वो चाहती है कि शादी के लिए मां-बाबा ने जो कर्ज लिया था, वो खत्म हो जाए।
गांवों की गलियों और पगडंडियों से पैदल चलकर छह किलोमीटर दूर स्कूल जाने वाली इस लड़की का दाखिला अब सरकार के कस्तूरबा बालिका आवासीय विद्यालय बघिमा पालकोट में कराया गया है।यहां ममता को बारहवीं तक पढ़ाई के लिए पोशाक, किताबें, जूते और भोजन मुफ्त मिलते रहेंगे।
ममता के फैसले पर 1 लाख इनाम की घोषणा
बात दो जनवरी की है जब ममता की शादी के लिए लड़के वाले उसके घर पहुंचे तो ऐन मौके पर पुलिस भी वहां पहुंची और ममता को अपने साथ ले गई। शादी न करने के ममता के इस फैसले पर सरकार ने उन्हें एक लाख रुपए इनाम देने की घोषणा की है।
ममता बताती हैं कि छोटी उम्र में शादी के सवाल पर उसने टोका जरूर था, पर घर वालों के सामने कड़ा विरोध नहीं कर सकी थी। उसे लगा कि मां-बाबा आर्थिक अभावों से गुजरते हैं, शायद इसलिए शादी कर रहे हैं।
कस्तूरबा स्कूल में नवीं कक्षा में पढ़ने वाली पल्लवी बताती हैं कि उन लोगों ने अपनी नई सहेली का स्वागत तालियों से किया था।
पहले पढ़ाई, फिर विदाई
ममता ने सभी लड़कियों को जब अपनी शादी तोड़ने की बात बताई, तो उसे बताया गया कि कस्तूरबा स्कूल का स्लोगन ही हैः पहले पढ़ाई, फिर विदाई।पिछले साल 26 जनवरी को कस्तूरबा स्कूल की लड़कियों के लिए इस अभियान की शुरुआत की गई थी।
स्कूल की छात्रा पूजा कहती है, "अशिक्षा के कारण गांवों में पुराने ख्यालात हैं। लड़कियों को बोझ समझा जाता है। लिहाजा कम उम्र में शादी कर दी जाती है। पर इस ख्याल को खत्म करना है।"
हफ्ते भर के दौरान ममता कई दौर से गुजरी है। अब वह दूसरी लड़कियों से घुल मिल रही है। वो पढ़ लिखकर शिक्षक बनना चाहती है। उसकी नजरें सरकार की घोषणा पर टिकी है।
वो कहती हैं, "पैसे मिलें, तो मां-बाबा ने शादी के लिए जो कर्ज लिया था, उसे चुका दूंगी। बाकी पैसे अपनी तथा भाई-बहनों की पढ़ाई पर खर्च करूंगी।" बघिमा स्कूल की वार्डन और शिक्षिका नीलन प्रभा केरकेट्टा समेत सभी शिक्षक और कर्मचारी भी स्कूल में ममता के दाखिले से खुश हैं।
अब बेटी के फैसले से खुश हैं माता-पिता
इससे पहले एक आदिवासी लड़की बिरसमुनी ने बाल विवाह से मना किया था। वो भी इसी स्कूल में छठी कक्षा में पढ़ती है। हम हापामुनी गांव भी गए। ममता के पिता रतन साहू, मां शालो देवी अपने दो अन्य बच्चों के साथ मिले। उनका दो कमरे का टूटा-फूटा खपरैल कच्चा मकान है।
घर के अंदर एक अलमारी और छोटे से आंगन में रखी रजाई, गद्दा और पलंग देखकर समझते देर नहीं लगी कि यह सब बेटी की शादी के लिए खरीदा गया था।
रतन बताते हैं कि वह ड्राइवरी करते हैं। खेती के लिए बित्ता भर भी जमीन नहीं है। क्या बेटी ने पहले शादी से मना नहीं किया था, वह कहते हैं, "यह सब अचानक हुआ।"
रतन कहते हैं कि अब बेटी पढ़ कर अपने पैरों पर खड़ी हो जाए, यही उनकी खुशी होगी। कर्ज चुकाने के लिए उन्हें हाड़तोड़ मेहनत करनी होगी।उनकी पत्नी शालो देवी बताती हैं कि कई लोगों से कुछ-कुछ करके करीब 45 हजार रुपए कर्ज लिए हैं। कुछ पैसे मजदूरी कर उन लोगों ने बचाए थे।
अब ममता के माता-पिता की सरकार से गुहार
शालो देवी कहती हैं कि सरकार से उन्हें गरीबी का राशन कार्ड और इंदिरा आवास मिल जाता, तो बड़ी राहत मिल जाती।क्या लड़के वाले नाराज नहीं हुए, इस सवाल पर ममता के चाचा कृष्णा साहू बताते हैं, "पहले तो वे गुस्सा हो गए पर उन्हें सच्चाई का पता चला, तो वे भी राजी होकर लौट गए।"
गांव में सामाजिक कार्यकर्ता बिंदेश्वर साहू का मानना है कि जाने-अनजाने तो रतन ने कम उम्र में बेटी की शादी तय कर दी, लेकिन शादी न करने के ममता के फैसले से गांव में लोगों को सीख मिली है।
गांव के ही सुरेंद्र साहू बताते हैं, "वे लोग तैयारियों में जुटे थे। पुलिस आकर ममता को ले गई, तो सभी सकपका गए, पर मिल जुलकर स्थिति को संभाला गया।"
घाघरा प्रखंड की नवनिर्वाचित प्रमुख सुनीता देवी भी रतन साहू के परिवार से मिलने पहुंची थीं। उन्होंने कहा कि ममता जैसी लड़की ने उनके प्रखंड का मान बढ़ाया है।उन्होंने साथ ही रतन साहू को सरकारी मदद दिलाने के लिए पहल करने का भरोसा भी जताया है।