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14 साल की 'लेडी टार्जन' जिसकी बात जंगली हाथी भी मानते हैं

Wed, 09 Oct 2013 11:11 AM IST
सलमान रावी
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ओडिशा के वन विभाग ने झारखंड से 14 साल की आदिवासी किशोरी को राऊरकेला स्टेडियम में उधम मचा रहे हाथियों के झुंड से बात करने के लिए बुलाया और उसे इसका मेहनताना भी दिया। यकीन नहीं होता न?
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इस बात की तसदीक करने वाले लोग भी हैं और सवाल करने वाले भी। मगर तब क्या कहेंगे जब सरकार एक लडकी को दूसरे राज्य से बुलाकर जंगली हाथियों से बात करवाती है और उसे इसका खर्च भी देती है।

ओडिशा राज्य के वन विभाग ने इस साल जून में 14 साल की आदिवासी बच्ची निर्मला टोप्पो से राऊरकेला शहर में घुसे 11 जंगली हाथियों के झुंड को वापस जंगल भेजने में मदद मांगी।
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निर्मला ओडिशा के पडोसी राज्य झारखंड के आदिवासी इलाके की रहने वाली हैं। वे अकेली नहीं आईं। निर्मला के गांव के दस नौजवान भी उनके साथ थे।

जब उन्होंने हाथियों से बात करनी शुरू की, तो वे राऊरकेला के स्टेडियम में थे। फिर हाथी जंगल में चले गए।

पैर में लगी चोट
कुआरमुंडा की कालूसीरा पंचायत के सरपंच बिक्रम ओराम कहते हैं, ''हम सब बहुत डर गए थे क्योंकि हाथियों का झुंड यहां के जंगलों से होता हुआ राऊरकेला में घुसा था। हमें लगा कि वहां शहर में हाथी काफी तांडव मचाएंगे मगर निर्मला के आने के बाद हमारी उम्मीदें जगीं। बिना ज्यादा नुकसान के निर्मला और उसके साथियों ने हाथियों के झुंड को वापस जंगल की तरफ भेजने में काफी अहम भूमिका निभाई।''

ओडिशा के पानपोश वन क्षेत्र अधिकारी पीपी ढोला बताते हैं कि जब शहर में 11 हाथियों का झुंड घुसा, तो विभाग ने निर्मला और उनके पिता से मदद मांगी। विभाग ने इसके एवज में निर्मला को पैसे भी दिए।

वन क्षेत्र अधिकारी के मुताबिक निर्मला और उनके साथ आए दल ने हाथियों के झुंड को स्टेडियम में चारों तरफ से घेरा और कुछ इशारे और बात करते हुए वो उस झुंड को निकालने में कामयाब हुए।

निर्मला ने मुझे बताया कि उन्हें इस काम के लिए 20 हजार रुपए दिए गए। इस दौरान जब निर्मला हाथियों के दल को शहर से बाहर हांकने का काम कर रहीं थीं तो उनके पैर में चोट लग गई, जो बाद में सेप्टिक में तब्दील हो गई।

मेरी मुलाकात निर्मला से राऊरकेला के एक सरकारी अस्पताल में हुई, जहां अब उनके पैरों के जख्म भर चुके हैं।
क्या सुनकर भागे हाथी?

निर्मला जंगली हाथियों से अपनी जुबान यानी 'मुंडारी' में बातें कर उन्हें वापस जाने के लिए 'मनाती' हैं।

निर्मला की मां को हाथियों ने तब मार दिया था, जब वे जंगल में पट्टे चुनने गईं थीं। इसका निर्मला के दिमाग पर गहरा असर हुआ और जब वो दस साल की हुईं, तो अपने पिता मरिनस टोप्पो के साथ मिलकर उन्होंने हाथियों के झुंड से निपटने की कला सीखनी शुरू कर दी।

मगर वो आखिर कैसे हाथियों को समझाकर मना पाती हैं?
ये पूछने पर निर्मला ने बताया, "मैं पहले प्रार्थना करती हूं। फिर हाथियों को अपनी भाषा यानी मुंडारी में कहती हूं कि वो चले जाएं। फिर हाथी चले जाते हैं।" निर्मला ने मुझे मायने के साथ-साथ अपनी जुबान में वे लफ्ज भी बताए, जो आप  यहां सुन सकते हैं।

निर्मला के दल में दस लोग हैं और सब उन्हीं के गांव के आसपास के रहने वाले हैं।

आवाज के असर को लेकर सभी तरफदार नहीं। सिमडेगा के सामाजिक कार्यकर्ता नील जस्टिन बेक कहते हैं कि झारखंड में निर्मला काफी लोकप्रिय हैं।

खासतौर पर जंगलों से लगे उन इलाकों में, जहां हाथियों के झुंड खेतों में घुस आते हैं और फसलें बर्बाद कर देते हैं।

वे कहते हैं कि कभी-कभार जब हाथी गांव में घुस आते हैं, तो निर्मला को बुलाया जाता है, जो अपनी टीम के साथ वहां पहुंचकर हाथियों सी बात कर "उन्हें वापस भेज" देती हैं।
लेडी टार्जन

नील का कहना है, "हाथी उनकी भाषा समझते हैं। वे उन्हें समझाती हैं और हाथी मान जाते हैं। अब कहीं भी अगर हाथियों का उत्पात होता है, तो लोग इलाके में वनविभाग को नहीं, बल्कि निर्मला और उसके दल को ही बुलाते हैं। कभी-कभी मजाक में हम उन्हें लेडी टार्जन कहकर भी बुलाते हैं।"

मगर कई सामाजिक संगठन हाथी से बात करने वाली को अंधविश्वास मानते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता रबी प्रधान कहते हैं कि ऐसी धारणा के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और विज्ञान इस बात का समर्थन नहीं करता है।

उनका कहना था कि ये संभव है कि चूंकि निर्मला आदिवासी हैं और झारखंड के गांवों की रहने वाली हैं, तो उन्हें वन्य जीवों को समझना शहर वालों से बेहतर आता होगा।

रबी कहते हैं, "आदिवासियों के अपने कुछ पारंपरिक तरीके भी होते हैं, जिसे हम नहीं समझ पाते। आदिवासियों को जंगली जानवरों के साथ रहने की आदत होती है। वे उनके तरीकों को बेहतर समझ सकते हैं क्योंकि सदियों से दोनों एकसाथ जंगल में रह रहे हैं।"

निर्मला टोप्पो के दल से ओडिशा के वन विभाग के लोग काफी कुछ सीख रहे हैं।

वन क्षेत्र अधिकारी ढोला का कहना है कि अब तक महकमे ने 20 ऐसे कर्मचारियों को तैयार किया है, जो निर्मला के दल की तरह ही हाथियों को भगाने में मदद करते हैं।
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