डोगरी मान्यता दिवस पर डोगरी संस्था की ओर से डोगरी भवन कर्ण नगर में बुधवार को तीन दिवसीय कार्यक्रम का आगाज हुआ। इसमें समाज कल्याण विभाग की प्रमुख सचिव शीतल नंदा बतौर मुख्य अतिथि मौजूद रहीं। साथ ही बड़ी संख्या में डोगरी भाषा के साहित्यकार पहुंचे थे, जिनमें डोगरी संस्था के प्रमुख प्रो. ललित मंगोत्रा, प्रो. वीना गुप्ता, पद्मश्री जितेंद्र उधमपुरी, चंचल भसीन, इंद्र जीत केसर आदि शामिल थे। पहले दिन आयोजित हुए कार्यक्रम में डोगरी भाषा, साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में योगदान पर मदन गोपाल पाधा, शिव मेहता, सुदेश राज, उषा किरण, रणधीर सिंह रायपुरिया, जनक खजूरिया, सूरज सिंह, प्रीति दुबे और सुरेंद्र सागर को सम्मानित किया गया।
डुग्गर प्रदेश जम्मू डोगरी भाषा की मान्यता का दिवस मना रहा है, लेकिन निजी स्कूल 19 साल बाद भी भाषा को अपना नहीं पाए हैं। निजी स्कूलों में डोगरी भाषा की जगह बच्चों को वैकल्पिक विषय के तौर पर फ्रेंच आदि भाषाओं को दिया जा रहा है। इतने लंबे सफर के बाद भी डोगरी भाषा को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यह स्थिति डोगरी मान्यता दिवस पर डोगरी भवन कर्ण नगर में बुधवार से शुरू हुए तीन दिवसीय कार्यक्रम में युवाओं ने स्पष्ट की।
2003 में डोगरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, जिसके उपलक्ष्य में डुग्गर प्रदेश डोगरी मान्यता उत्सव मना रहा है। लेकिन मान्यता मिलने के 19 साल बाद डोगरी भाषा को वह मान्यता नहीं मिली है। यह भाषा पहले घरों तक सीमित रही और अभी तक स्कूल इसे अपना नहीं पाए हैं।
इतिहास एकीकृत संस्कृति और विरासत में एमए कर रही हूं, जिस कारण डोगरा विरासत, भाषा और संस्कृति से जुड़ पाई हूं। स्कूल और कॉलेज में डोगरी नहीं पढ़ी, जिसका कारण जागरूकता का अभाव है। आज भी स्कूली स्तर पर डोगरी भाषा नहीं पढ़ाई जा रही है। नई शिक्षा नीति में स्थानीय भाषा में पढ़ाई का प्रावधान है, लेकिन अमल नहीं हो रहा है।
-आकृति शर्मा, छात्रा, क्लस्टर विश्वविद्यालय।
डोगरी भाषा के प्रति रुझान था, क्योंकि इसी परिवेश में रही हूं। स्कूल में डोगरी भाषा पढ़ाई नहीं जाती थी। जब कॉलेज पहुंची तो इसके प्रति जागरूकता नहीं थी। डोगरी मातृ भाषा है। हमें इससे दूर रखा गया। हम नहीं चाहते हैं कि भावी पीढ़ी भी इसी स्थिति का सामना करे। डोगरी भाषा को बढ़ावा देने की जरूरत है।
- निकिता शर्मा, छात्रा, आर्ट्स संकाय, महिला कॉलेज परेड।
जम्मू संभाग में डोगरी भाषा के कई नामी साहित्यकार हैं, जिन्होंने भाषा का अभी तक जिंदा रखा है। स्कूलों में डोगरी भाषा को पढ़ाने की जरूरत है। पंजाब में पंजाबी, तो कश्मीर में कश्मीरी को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन यहां पर स्थिति विपरीत है। हमें भी डोगरी के उत्थान के लिए काम करना होगा।
- शिवाली शर्मा, छात्रा, आर्ट्स संकाय, महिला कॉलेज परेड।
डोगरी के प्रति लगाव के चलते डोगरी विभाग में प्रवेश लिया है। डोगरी भाषा के बढ़ावा देना है तो पहले खुद डोगरी से जुड़ना होगा। निजी स्कूलों में डोगरी भाषा वैकल्पिक विषय के रूप में नहीं पढ़ाई जा रही है। इस ओर सोचना होगा।
-जयति गुप्ता, कनिष्ठ सहायक, जम्मू विश्वविद्यालय।