इस एयरबेस से पूर्वी लद्दाख के उप क्षेत्र उत्तर में हवाई संचालन और रसद पहुंचाना आसान होगा। बमरोधी हैंगर और उन्नत सुविधाओं के साथ राफेल और सुखोई-30 जैसे लड़ाकू विमान आसानी से उड़ान भर सकेंगे। लेह और थोईस एयरबेस की तुलना में विश्वसनीय संचालन होगा।
वायुसेना 2020 के गलवां संघर्ष के दौरान सी-130जे, एएन-32 और अपाचे हेलिकॉप्टरों के लिए न्योमा के एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड का इस्तेमाल कर चुकी है। कर्नल पोनुंग डोमिंग के नेतृत्व में परियोजना न्योमा को प्रमुख कमांड-एंड-कंट्रोल केंद्र बनाएगी। इससे ड्रोन व हमलावर हेलिकॉप्टरों को सहायता मिलेगी।
चीन के आक्रामक सैन्य निर्माण का सीधा जवाब
रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह पूर्वी लद्दाख में भारत की वायु शक्ति को बढ़ाएगा। गलवां संघर्ष के बाद से चीन के साथ चल रहे तनाव से यह चिह्नित क्षेत्र है। लेह की तुलना में न्योमा की समतल घाटी और अधिक स्थिर मौसम लड़ाकू और परिवहन विमानों का परिचालन आसान होगा। ये बुनियादी ढांचा एलएसी पर चीन के आक्रामक सैन्य निर्माण का सीधा जवाब है।