नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे ने 2019 और 2020 का सर्वे किया। इसमें बताया गया कि जम्मू कश्मीर में 18 से 49 आयु वर्ग की 9.6 फीसदी महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हैं। जबकि 2015 में जब नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे ने सर्वे किया तो यह आंकड़ा 9.4 था। सर्वे में यह भी बताया गया कि जम्मू-कश्मीर में ग्रामीण इलाकों में शारीरिक प्रताड़ना और हिंसा के मामले अधिक हैं।
महिलाओं के खिलाफ हिंसा को लेकर प्रदेश का महिला आयोग दोबारा से गठित होने के लिए दो साल से इंतजार में है। ऐसे में हिंसा से पीड़ित महिलाओं के लिए अपनी शिकायत करने के लिए पुलिस ही एक मात्र सहारा है।
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जम्मू-कश्मीर से 370 हटने से पहले यहां महिला आयोग काम करता था। लेकिन प्रदेश का पुनर्गठन होने पर यह आयोग खत्म कर दिया गया। इसका दोबारा पुनर्गठन होगा। लेकिन दो साल के बाद भी इसका गठन नहीं हो पाया है। इसका असर महिलाओं के प्रति हिंसा के मामलों पर पड़ा है।
एक साल में 900 शिकायतें
प्रदेश में महिलाओं के प्रति हिंसा बढ़ी है। महिलाओं के लिए बनाए गए हेल्पलाइन नंबर 181 पर 2020 में 922 शिकायतें पहुंचीं। इसमें 619 मामले घरेेल हिंसा, पांच पाक्सो, 47 साइबर अपराध और 251 अन्य श्रेणियों में थे। वहीं पिछले तीन साल की बात करें तो जम्मू कश्मीर में अकेले कश्मीर में ही 1756 केस दर्ज हुए हैं। जबकि प्रदेश में 3600 से ज्यादा केस हैं। जम्मू की तुलना में कश्मीर में महिलाओं के प्रति हिंसा के अधिक मामले हैं।
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थानों में शिकायतें सुनने या फिर थानों का माहौल कैसा है, इससे हर कोई वाकिफ नहीं है। महिलाओं के साथ बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं, जो वो एक महिला से ही साझा कर सकती हैं। इसके लिए महिला आयोग एक बड़ा प्लेटफार्म था। यह एक अहम संस्थान था। जिसका पुनर्गठन होना बेहद जरूरी है। बेशक इसकी कमान केंद्रीय आयोग के हाथ ही हो, लेकिन प्रदेश में इसका कोई कार्यालय तक नहीं तो महिलाएं कहां अपनी शिकायत लेकर जाएं। -अंकुुर शर्मा, वरिष्ठ एडवोकेट