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'साइलेंट विलेज की बेटियों का जज्बा': तिरंगे के लिए खाना तक छोड़ दिया, तीन बहनों ने घर-घर पहुंचाया तिरंगा

Fri, 14 Aug 2026 02:27 PM IST
Nikita Gupta अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

डोडा के साइलेंट विलेज धड़काई की तीन मूक-बधिर बहनों ने तिरंगे के लिए कपड़ा मंगवाने की जिद की और पांच दिनों में 150 से अधिक तिरंगे सिलकर गांव में बांटे। उनकी पहल से पहली बार हर घर तिरंगा अभियान गांव तक पहुंचा और स्वतंत्रता दिवस से पहले लगभग हर छत तिरंगे से सज गई।
 
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तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज - फोटो : instagram
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में समुद्र तल से करीब 9,150 फीट की ऊंचाई पर बसे धड़काई गांव में इस बार स्वतंत्रता दिवस का जश्न कुछ खास है। भारत का साइलेंट विलेज कहे जाने वाले इस दूरदराज गांव की तीन बहनों ने बिना एक शब्द बोले देशभक्ति की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसने पूरे गांव को तिरंगे के रंग में रंग दिया।

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रेशमा बीबी (26), परवीन कौसर (24) और साइरा खातून (22) बोल और सुन नहीं सकतीं। इसके बावजूद उन्होंने पिता से तिरंगा बनाने के लिए कपड़ा लाने की जिद पकड़ ली। बहनों ने यहां तक कि कपड़ा मिलने तक खाना खाने से इनकार कर दिया। आखिरकार उनके पिता रेहम अली बाजार से कपड़ा लेकर आए जिसके बाद तीनों बहनों ने तिरंगे सिलने शुरू कर दिए।

पिछले पांच दिनों में तीनों बहनें 150 से अधिक तिरंगे तैयार कर गांव के लोगों को बांट चुकी हैं। उनकी इस पहल से हर घर तिरंगा अभियान पहली बार धड़काई के इस दूरदराज हिस्से तक पहुंचा है।

करीब 2,000 की आबादी वाले धड़काई गांव में अधिकांश लोग आदिवासी गुज्जर समुदाय से हैं। गांव सड़क संपर्क से भी कटा हुआ है। यहां 90 से अधिक लोगों में जन्मजात सुनने और बोलने की समस्या है, जिसके कारण इसे ‘साइलेंट विलेज’ के नाम से जाना जाता है।

चार साल का इंतजार हुआ खत्म
स्थानीय लोगों के मुताबिक वे वर्ष 2022 से हर घर तिरंगा अभियान के बारे में जानते थे, लेकिन गांव की दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण अब तक यह अभियान धड़काई-बी तक नहीं पहुंच पाया था। स्थानीय निवासी जमात दानिश ने कहा कि तिरंगे को गांव की छतों पर लहराते देखने का चार साल का इंतजार आखिरकार खत्म हो गया। अब गांव की लगभग हर छत पर तिरंगा नजर आ रहा है और बच्चे हाथों में राष्ट्रीय ध्वज लेकर गर्व के साथ घूमते दिखाई दे रहे हैं।
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इशारों की भाषा में देशभक्ति का संदेश
धड़काई के लोग दशकों से अपनी एक अलग सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसे गांव के लोग आसानी से समझ लेते हैं। तीनों बहनों की पहल ने इसी भाषा वाले गांव में देशभक्ति का नया रंग भर दिया है।

बहनों के पिता रेहम अली ने गर्व से बताया कि जब वे चरागाह से लौटे तो बेटियों ने इशारों में तिरंगे के लिए कपड़ा लाने की बात कही। उनकी जिद इतनी मजबूत थी कि कपड़ा मिलने तक उन्होंने खाना तक नहीं खाया। गांव के बुजुर्ग और पूर्व सरपंच हाजी अब्दुल लतीफ ने भी बहनों के प्रयास की सराहना की। इन बेटियों ने बिना एक शब्द बोले यह दिखा दिया कि देश से जुड़ाव, देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम को व्यक्त करने के लिए आवाज की जरूरत नहीं होती।
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