रेशमा बीबी (26), परवीन कौसर (24) और साइरा खातून (22) बोल और सुन नहीं सकतीं। इसके बावजूद उन्होंने पिता से तिरंगा बनाने के लिए कपड़ा लाने की जिद पकड़ ली। बहनों ने यहां तक कि कपड़ा मिलने तक खाना खाने से इनकार कर दिया। आखिरकार उनके पिता रेहम अली बाजार से कपड़ा लेकर आए जिसके बाद तीनों बहनों ने तिरंगे सिलने शुरू कर दिए।
पिछले पांच दिनों में तीनों बहनें 150 से अधिक तिरंगे तैयार कर गांव के लोगों को बांट चुकी हैं। उनकी इस पहल से हर घर तिरंगा अभियान पहली बार धड़काई के इस दूरदराज हिस्से तक पहुंचा है।
करीब 2,000 की आबादी वाले धड़काई गांव में अधिकांश लोग आदिवासी गुज्जर समुदाय से हैं। गांव सड़क संपर्क से भी कटा हुआ है। यहां 90 से अधिक लोगों में जन्मजात सुनने और बोलने की समस्या है, जिसके कारण इसे ‘साइलेंट विलेज’ के नाम से जाना जाता है।
चार साल का इंतजार हुआ खत्म
स्थानीय लोगों के मुताबिक वे वर्ष 2022 से हर घर तिरंगा अभियान के बारे में जानते थे, लेकिन गांव की दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण अब तक यह अभियान धड़काई-बी तक नहीं पहुंच पाया था। स्थानीय निवासी जमात दानिश ने कहा कि तिरंगे को गांव की छतों पर लहराते देखने का चार साल का इंतजार आखिरकार खत्म हो गया। अब गांव की लगभग हर छत पर तिरंगा नजर आ रहा है और बच्चे हाथों में राष्ट्रीय ध्वज लेकर गर्व के साथ घूमते दिखाई दे रहे हैं।
इशारों की भाषा में देशभक्ति का संदेश
धड़काई के लोग दशकों से अपनी एक अलग सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसे गांव के लोग आसानी से समझ लेते हैं। तीनों बहनों की पहल ने इसी भाषा वाले गांव में देशभक्ति का नया रंग भर दिया है।
बहनों के पिता रेहम अली ने गर्व से बताया कि जब वे चरागाह से लौटे तो बेटियों ने इशारों में तिरंगे के लिए कपड़ा लाने की बात कही। उनकी जिद इतनी मजबूत थी कि कपड़ा मिलने तक उन्होंने खाना तक नहीं खाया। गांव के बुजुर्ग और पूर्व सरपंच हाजी अब्दुल लतीफ ने भी बहनों के प्रयास की सराहना की। इन बेटियों ने बिना एक शब्द बोले यह दिखा दिया कि देश से जुड़ाव, देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम को व्यक्त करने के लिए आवाज की जरूरत नहीं होती।