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कर्ज में डूबता जम्मू-कश्मीर: हर प्रदेशवासी पर एक लाख रुपये से ज्यादा का उधार, बजट से ज्यादा उधारी का बोझ

Sun, 08 Feb 2026 11:45 AM IST
निकिता गुप्ता गौरव रावत अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने के साथ-साथ प्रदेश पर कर्ज का बोझ भी तेजी से बढ़ा है। स्थिति यह है कि कुल देनदारियां अब सालाना बजट से अधिक हो चुकी हैं और कर्ज जीएसडीपी के करीब 48 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
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कर्ज (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था का आकार बीते कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है लेकिन इसके साथ सरकार पर कर्ज का बोझ भी तेजी से बढ़ता गया है। स्थिति यह है कि प्रदेश पर मौजूद कुल कर्ज अब सरकार के पूरे साल के बजट से भी ज्यादा हो चुका है जिससे वित्तीय दबाव और विकास की चुनौती साफ दिखाई देने लगी है।

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बजट के अनुसार 2024-25 के अंत तक प्रदेश पर कुल देनदारियां 1,37,067 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी हैं। इसके मुकाबले 2026-27 के लिए सरकार ने 1,13,767 करोड़ रुपये का कुल बजट प्रस्तावित किया है। यानी सरकार पर चढ़ा कर्ज पूरे साल के बजट से करीब 23 हजार करोड़ रुपये ज्यादा है। यह स्थिति बताती है कि सरकार को खर्च चलाने और दायित्व निभाने के लिए लगातार उधारी का सहारा लेना पड़ रहा है।

कर्ज को प्रदेश की आर्थिक क्षमता से जोड़कर देखें तो तस्वीर और साफ होती है। 2025-26 में जम्मू कश्मीर की सकल राज्य घरेलू उत्पाद यानी जीएसडीपी 2,88,422 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। इसके मुकाबले कुल कर्ज जीएसडीपी के करीब 48 प्रतिशत के बराबर पहुंच चुका है। आसान शब्दों में कहें तो प्रदेश साल भर में जितना कमाता है, उसका लगभग आधा हिस्सा कर्ज के बराबर हो गया है।

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प्रदेश पर ऐसे बढ़ता गया कर्ज का बोझ
वर्ष कुल कर्ज (करोड़ रुपये) जीएसडीपी का प्रतिशत
2015-16 57,000 38%
2016-17 63,000 40%
2017-18 70,500 42%
2018-19 78,000 44%
2019-20 86,500 46%
2020-21 98,000 50%
2021-22 1,08,500 51%
2022-23 1,18,900 50%
2023-24 1,28,400 49%
2024-25  1,37,067  48%

कर्ज चुकाने में जाएगा विकास का पैसा
2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश की आबादी करीब 1.25 करोड़ है। इस आधार पर प्रति व्यक्ति हिस्से में कर्ज का बोझ औसतन एक लाख रुपये से ज्यादा बैठता है।

कर्ज का असर बजट पर भी साफ दिखाई देता है। सरकार को हर साल बड़ी राशि केवल पुराने कर्ज और उसके ब्याज की भरपाई में खर्च करनी पड़ रही है। वर्ष 2026-27 के बजट में ब्याज भुगतान के लिए 12,283 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह रकम बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के बजाय कर्ज और उसके ब्याज की भरपाई में चली जाएगी।

स्कूलों को ज्यादा पैसा, कॉलेजों और अस्पतालों पर कम खर्च
बजट में यह साफ दिखता है कि सरकार ने खर्च की प्राथमिकताएं दो हिस्सों में बांटी हैं। कुछ विभागों का बजट बढ़ाया गया है जबकि कई अहम क्षेत्रों में कटौती की गई है। स्कूली शिक्षा को ज्यादा संसाधन मिले हैं लेकिन उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, कृषि और उद्योग जैसे विभागों को पहले के मुकाबले कम बजट में काम चलाना होगा।

बजट के ये बदलाव बताते हैं कि सरकार इस साल किन क्षेत्रों को आगे बढ़ाना चाहती है और किन पर खर्च सीमित रखा गया है। सरकार ने स्कूली शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए इस क्षेत्र के लिए बजट बढ़ाया है। दूसरी तरफ उच्च शिक्षा का बजट घटाया गया है जिससे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नए भवन, प्रयोगशालाओं और शैक्षणिक विस्तार की गति धीमी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भी संसाधनों का दबाव दिखता है। बजट में बिजली विकास विभाग को पहले के मुकाबले कम राशि दी गई है। सबसे ज्यादा कटौती इसी विभाग में हुई है। इसी तरह कृषि और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी कटौती की गई है जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, निजी निवेश और रोजगार सृजन पर असर पड़ने की आशंका है।
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विभागों को आवंटित बजट और उसका अंतर
विभाग    2025-26  2026-27 अंतर
स्कूल शिक्षा 12,014.90 12,988.72 +973.82
उच्च शिक्षा 2,193.40 2,150.16 -43.24
स्वास्थ्य एवं चिकित्सा 8,813.71 8,654.77 -158.94
जनजातीय मामले 442.99 406.01 -36.98
संस्कृति 204.59 176.23 -28.36
युवा सेवाएं व कौशल 847.16 878.92 +31.76
विधि विभाग 1,122.45 1,111.56 -10.89
राजस्व विभाग 810.74 784.61 -26.13
बिजली विकास 13,343.52 12,543.83 -799.69
लोक निर्माण विभाग 5,283.75 5,298.43 +14.68
ग्रामीण विकास 4,754.86 4,565.70 -189.16
उद्योग व वाणिज्य 1,086.03 866.16 -219.87
पर्यटन 612.80 666.23 +53.43
कृषि उत्पादन 2,583.70 2,423.87 -159.83
(नोट - राशि करोड़ रुपये में)
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