जिले में जंगलों के संरक्षण के लिए सरकार द्वारा मास्टर प्लान बनाए जाने के बावजूद जंगलों का संरक्षण सही प्रकार से नहीं हो पा रहा है। इसमें सबसे अधिक बाधा फंड की कमी है।
राजोरी डिवीजन के डीएफओ अनूप सोनी के अनुसार समर सीजन शुरू होने से पहले ही वन विभाग जंगलों में आग लगने की घटनाओं को रोकने के लिए कदम उठाना शुरू कर देता है।
इसके लिए सबसे पहले कई स्थानों पर फायर लाइंस बनाई जाती हैं। यह अस्थायी फायर लाइन काफी हद तक आग पर काबू पाने में सफल होती है। यदि स्थायी तौर पर फायर लाइन बनाई जाएं तो आग पर काबू पाने में अधिक दिक्कतें नहीं आती हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि स्थायी फायर लाइन बनाने के लिए फंड उपलब्ध नहीं होते हैं।
कई संवेदनशील स्थानों पर सीजनल फायर वॉचर नियुक्त कर कहीं भी आग लगने पर सूचना शेयर करने का काम भी किया जाता है। डिवीजन में करीब 35 ऐसे वाचर्स नियुक्त किए गए हैं, जो कहीं भी आग की घटना लगने की सूचना विभागीय अधिकारियों को देते हैं। इन वॉचरों की संख्या बढ़ाने की भी जरूरत है। इसके अलावा फायर कंट्रोल रूम भी बनाए गए हैं।
राजोरी डिवीजन में कई संवेदनशील स्थानों पर बनाए गए कंट्रोल रूम में चार से छह कर्मचारी नियुक्त किए गए हैं। ये कर्मचारी भी आग लगने की घटना को अधिकारियों तक पहुंचाते हैं। इसके साथ ही फायर पर नजर रखने के मकसद से फायर वॉच टावर भी खड़े किए जाते हैं। फायर वॉच टावरों के माध्यम से दूरबीन का प्रयोग कर जंगल में दूर तक नजर रखी जाती है।
इसके बावजूद कई बार आग लगने से उठने वाला धुंआ दूरबीन से भी नजर नहीं आता है और आग फैल जाती है। इन फायर टावरों को अधिक आधुनिक और मजबूत बनाने के लिए भी फंड की कमी ही आड़े आती है।
इतना ही नहीं जंगलों में कई स्थानों पर जल संचयन संरचनाएं भी बनाई जाती हैं, ताकि उनमें भरा जाने वाला बारिश का पानी आग पर काबू पाने के लिए प्रयोग किया जा सके। डीएफओ के अनुसार जितने संरचनाएं बनाई गई हैं वे कम हैं। इनको अधिक बढ़ाने की जरूरत है। यह आग को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।