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साठ सालों में कई बार झेला है बर्बादी का जख्म

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सितंबर माह के पहले सप्ताह में कुदरत के कहर ने लोगों की जिंदगी को तहस-नहस कर दिया। इस कहर से बाहर निकलने में लोगों को कई वर्ष लग जाएंगे। रियासत में बाढ़ और बाढ़ के कारण हुई तबाही के बारे में गौर किया जाए तो रियासत में पहली बार बाढ़ नहीं आई है।
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पिछले साठ साल में रियासत कई बार बाढ़ का दंश झेल चुकी है। बाढ़ के कारण न सिर्फ कश्मीर प्रभावित हुआ था, बल्कि जम्मू संभाग के लोगों को भी कई परेशानियों का सामना करना पड़ा था।

रियासत के इतिहास पर गौर किया जाए तो 1950, 1951, 1953, 1954, 1956, 1957, 1959 में भारी बारिश और बाढ़ ने घाटी में विकराल रूप दिखाया था। साठ और अस्सी के दशक में भी जन्नत कही जाने वाली कश्मीर घाटी जलप्रलय का शिकार हुई है।
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हर बाढ़ लेती रही है सैकड़ों की बलि

रियासत के इतिहास के मुताबिक 1950 में झेलम का जलस्तर बढ़ जाने के कारण घाटी का पूरा सत्तर मील इलाका पानी में डूबा था। इस बारिश ने जम्मू में भी कहर बरपाया था।

उन दिनों बारह हजार के करीब लोगों के घर तबाह हुए थे। घाटी ने 1957 और 1959 में भी बाढ़ के कारण भारी तबाही झेली थी। इस बाढ़ ने घाटी की खूबसूरत तस्वीर को बिगाड़ कर रख दिया था।

36 हजार से लेकर 50 हजार क्यूसेक के करीब झेलम नदी में 1957 में दक्षिण कश्मीर में बहने वाली संगम नदी का चौबीस हजार क्यूसेक पानी छोड़े जाने के कारण घाटी में बाढ़ के हालात पैदा हो गए थे, जिसके कारण घाटी के करीब छह सौ गांव तबाह हुए थे और 41 लोगों की जानें गई थीं।

1973 में बाढ़ से प्रभावित हुए थे बीस फीसदी लोग

जुलाई 1959 में भारी बारिश से सत्रह हजार क्षमता वाली झेलम नदी में अस्सी हजार से एक लाख क्यूसेक पानी बढ़ गया था। इस बाढ़ के कारण 82 लोगों को अपनी जानें गवानी पड़ीं थी और लाखों रुपये के करीब फसलों और अन्य चीजों का नुकसान झेलना पड़ा था।

वर्ष 1960, 1962, 1963, 1964, 1969 और 1972 में भी भारी बारिश से घाटी में करोड़ों रुपयों के हिसाब से फसल और संपत्ति का नुकसान हुआ था।

वर्ष 1973 में आई बाढ़ के दौरान राज्य की बीस प्रतिशत तक की आबादी बुरी तरह से प्रभावित हुई थी। चालीस के करीब गांवों में बाढ़ के कारण फसल और संपत्ति का बहुत ही ज्यादा नुकसान झेलना पड़ा था।

अस्सी के दशक में तबाह हुए थे तीन सौ गांव

इस बाढ़ में कश्मीर घाटी में 21 और जम्मू संभाग में पचास लोगों की मौत हुई थी। वहीं 12 करोड़ रुपये तक की संपत्ति का नुकसान हुआ था। उसके बाद 1976, 1986, 1988 में भी बारिश के कारण रियासत में दो करोड़ पचास हजार रुपये की एक लाख 66 हजार क्विंटल तक की फसल तबाह हुई थी।

तीन सौ गांवों को नुकसान पहुंचा। रिपोर्ट के मुताबिक 1992 में घाटी के उत्तर पश्चिम जिलों में बारिश के कारण साठ हजार के करीब लोग प्रभावित हुए थे, जबकि दो सौ लोगों की मौत हो गई थी।

भारी बारिश और बाढ़ के कारण न सिर्फ घाटी के लोग, बल्कि पाकिस्तान के लोग भी बुरी तरह से प्रभावित हुए थे। उसके बाद छह अगस्त 2010 में लेह-लद्दाख में बादल फटने के कारण आई बाढ़ से बहुत तबाही मची थी।
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बादल फटने से तबाह हो चुका है लेह-लद्दाख

इस तबाही ने लेह शहर को तहस-नहस करके रख दिया था। लेह में हुई त्रासदी के दौरान ढाई सौ लोगों की जान गई थी। इस वर्ष सितंबर महीने में बाढ़ की तबाही ने भी कई लोगों की जिंदगी को तबाह करके रख दिया।

इस बाढ़ में सैकडों लोगों की जानें चली गई हैं, जबकि लाखों लोग बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। जम्मू संभाग के ग्रामीण क्षेत्र, जिसमें अखनूर, हमीरपुर कोठी, परगवाल, फ्लाएं मंडाल, मकबाल, सूड़े चक्क, इसराराबाद, बशीर गुज्जर बस्ती, गुज्जर नगर, गोरखा नगर, पुंछ और राजोरी जिले भी बाढ़ से ज्यादा प्रभावित हुए।

वहीं घाटी के जवाहर नगर, इंद्रा नगर, लाल चौक, शिव पोरा, उज्ज बाग और अन्य इलाकों को बुरी तरह से तहस-नहस कर दिया है। बारिश और बाढ़ के एक सप्ताह गुजरने के बावजूद अब भी घाटी के कई इलाके कई फीट तक के बाढ़ के पानी में डूबे हुए हैं। भारतीय सेना और एयर फोर्स के जवान बाढ़ प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों को राहत सामग्री मुहैया करवाने में भरपूर योगदान दे रहे हैं।
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