जम्मू विश्वविद्यालय ने लिंगदोह समिति की सिफारिशों के मुताबिक पहली बार चुनाव कराने का दावा तो किया, लेकिन विश्वविद्यालय खुद इन सिफारिशाें की धज्जियां उड़ा रहा है। उसने दो साल का पेंच लगाकर छात्रों के चुनाव लड़ने और मतदान करने पर रोक लगा दी, जबकि सिफारिशों में यह मियाद न्यूनतम एक साल होने की बात कही गई है। कोर्स जरूर पूर्णकालिक होना चाहिए।
छात्र नेताओं का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन अपने कुछ खास छात्रों को फायदा पहुंचाने की नीयत से लिंगदोह समिति की सिफारिशों का उल्लंघन कर रहा है। एमलिब वाले छात्रों को भी एक साल का पूर्णकालिक कोर्स होने के बावजूद मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया गया। इसी मुद्दे पर उन्होंने ऐन वोटिंग वाले दिन विश्वविद्यालय की डीन छात्र कल्याण (डीएसडब्ल्यू) के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन भी किया, लेकिन प्रो. सतनाम कौर ने उन्हीं सिफारिशों का हवाला देते हुए इन छात्रों को समझा-बुझा दिया, जो लिंगदोह समिति की सिफारिशों का हिस्सा ही नहीं।
यही मुद्दा उठाते हुए डिप्लोमा इन ह्यूमन राइट्स के एक वर्षीय कोर्स के छात्र यशोवर्धन सिंह भी अन्य छात्रों के साथ कोर्ट पहुंचे हैं। उन्होंने जम्मू विश्वविद्यालय पर लिंगदोह समिति की सिफारिशों के उल्लंघन का मुद्दा उठाते हुए छात्र हितों को ताक पर रखने की बात कही है। यशोवर्धन सिंह का भी कहना है कि जब सिफारिशों में एक साल का जिक्र है तो दो साल की योग्यता विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपनी तरफ से कैसे नियत कर ली? साफ है कि विश्वविद्यालय खुद कुछ छात्रों को दो साल पेंच लगा चुनाव से दूर रखने की कोशिश कर रहा है।